Kavita Ki Hawa | Kanishka episode artwork

EPISODE · Dec 19, 2023 · 5 MIN

Kavita Ki Hawa | Kanishka

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

कविता की हवा | कनिष्काजब भीपापड़ तिलौरीचुराछनतेढक के न रखेंतो हवा लगने से खराब हो जातेहवा न लगे इसलिएमेहमानों को परोसे गए बचेबिस्कुटमठरीनमकीननमकपारोंजैसी चीजों को डब्बे मेंबंद करके रखा जाता हैताकि हवा न लगेहवा लगना कभी भीअच्छा नहीं माना गयाहवाएँ एक भुलक्कड़ जलचर हैजो संसार रुपी समुद्र में यहाँ वहाँ किसी से भी जाटकरा उसे अपने गिरोह में मिला लेते हैंपत्थरों को जब हवा लगी तोवह तैरना भूल गएपानी को हवा लगी तो ठहरना भूल गईवैसे ही परिवर्तनीय प्रकृति को हवा लगीतो वह स्थिरता भूल गईनाना को हवा लगी तो वो साँस लेना भूल गएसुगना जब पढ़ने विदेश गईतो घर भूल गईदादी ने कहाउसे हवा लग गई हैजब बबलू को हवा लगीतो वो माँ बाप भूल गयाहवा लगने के क्रम मेंबस जब घर को हवा लगी तोवो कुछ भी नहीं भूलेबस चुपचाप दो हिस्सों मेंएक लकीर के सहारे खड़े रहेमाँ कविता लिखती हैबेहिसाब लिखती हैवो घंटो नल के आगे बैठतीजैसे नल कोई फनकार हैऔर नल से कविता के शब्दबह रहे हैमाँ जब भी किसी काम में देर करतीघरवाले सोचतेकविता गढ़ रही होगीवो सुनाने जाती तोघरवाले कहतेइन सब के लिए उनके पास टाइम नहींशायद इसीलिए क्योंकि माँ नेकविता में एकान्त ढूंढ लिया हैवो इस तरह एकान्त पर पसरेगीके यादों के चमकीले टुकड़े सीने से पिघल जाएंगेफिर गाहे गाहे माँ के पूरे शरीर को कलेजा चूस लेगाउनका कलेजा बढ़ते बढ़तेघरशहरब्रह्मांडऔर इश्वर तक कोनिगल लेगाफिर वोखुदको जान जाएगीऔर ये घरवालों के लिए ख़तरनाक हैअगर ऐसा हुआतो समाज स्त्रियों को ब्लैक होल साबित कर देगाइसलिएबच जाता हैमाँ के लिएआधे चाँद पर रगड़ा नूनऔर एक रोटी के बराबर का पेटउनसे कितना कहाबिन मसाले का पकाओबढती उम्र में ये सब हम नहीं खा सकतेतब भी बूढ़ी माँ अपनी कविताओं को कभीपक रहे सादे भात में मिला देती हैकभी फीकी दाल मेंतो बेस्वाद सी हो सकने वाली खिचड़ी मेंइस तरह कई बारबस कविताओं ने बनाया माँ के पकवानों कोशायद वो नहीं भूली वो ठंडे दिनजब ग़रीबी में मसालों ने नहींबल्कि भूख और तिरस्कार में जन्मी कविताओं नेबचाया रसोई कोउनके परेशान और घबराए हुए स्पंदनहमारे कपड़ोंऔर बाकी सामानो पर लिपटकरऐसे घूरते के जैसे हमने फिर कोई नादानी का फूलउनसे बचकर बालों की बेल पर हल्के से रख दिया होवो कविताओं से रोज चूल्हा नीपतीऔर जलावन के टुकड़ों पर गीत को सजातीउनके गीत अपने हुनर के चर्म परजुदा हुए प्रेमियों को मिला देतेमाँ प्रेम में एक गोताखोर हैआभाव और दुख के दिनों मेंडुबकी मार वो चुन लाती रहीखुदको ढूंढ़ते हुएकच्ची मछलियों वाली प्रेरणाया फिर डुबकी मारपूर्व जन्म की मेरी माँ यशोधरातथागत को सौंपने निकल गईअपना गर्भ जिसमें जन्मों सेपालती जिम्मेदारी मेंवो नहीं ढूंढ पाई थी खुदकोघरवालों को डर हैमाँ के काफ़िर होते जा रहे शब्दफतवे की मज़ार को लाँघ जाएंगेक्योंकि माँ को हवा लगने लगी हैइसलिए थोड़ी न माँ कोगृहस्ती के डिब्बे में बंद किया थामाँ को हवाओं के विपरित रक्खा है ताकिवो यतीम हवाओं को गोद न ले लेवरना किताबों में उनके देवी होने के प्रमाणउन्हें सजीवएक हुनरबाज़ तैराक चिकना पत्थर बना देंगेजिसके कोरे दर्पण में खुदकी परछाई को रचकर माँ खुदकोनिहारती रहेगी किसी जोगन की तरह कल्पों तकमाँ की उम्रशाख की डाल पर चुपचाप सूखकरफिसलने लगती हैउनकी कविताएँ अपनी केंचुली उतारकरटाँग देते हैं हर जगहजहाँ जहाँ माँ कविताएँ भूल जाती हैतो कविताएँ मृत्यु की सुरंग से गुज़र पकोड़े के तेल सेसने कागज़ से बाहर आमाँ की तलाश मेंफस गए तयखाने के जालों मेंतो अलमारी के पीछे बचे कचड़े मेंइनपर भी नहीं तोइक सिरफिरे प्रेमी की कटी कलाई की तरहउखड़ आए दीवारों की पपड़ियों सेआखरी बार पानी दिए गए सूखे पुराने गमले मेंऐसा नहीं है की माँ अच्छी सफाई नहीं जानतीबस उन कोनों से उसी तरह सरक जाती हैजैसे औरतों कोघर और वसीयतों से सरकाया गयाइस बार वो अपने बच्चों के स्थान परअपनी माँ रुपी कविताओं की कोख से निकलउन्हें अलगाववादी घोषित कर देती हैक्योंकि माँ को आशंका हैमाँ को कविताओं की हवा लग गई हैतो इस बार अगर कविताएँउन से टकराई तोडिब्बा खुल जाएगाऔर माँ उड़ जाएगीक्योंकि माँ को हवा लग जाएगी

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