EPISODE · Dec 29, 2023 · 3 MIN
Lok Jagat Ka Ladka | Devansh Ekant
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
लोक जगत का लड़का | देवांश एकांतलगभग देहात और लगभग बीहड़ के बीच सेवह लगभग क़स्बा आया थाऔर उसे यह क़स्बालगभग से आगे बढ़पूरा का पूरा शहर लगा थाउसकी आँखों मेंबल्ब का प्रतिबिम्बअसल रोशनी से अधिक जगमगायामेज़ पर रखा कम्प्यूटर देख स्टीव जॉब्सया बिल गेट्स भी इतना उत्साहित न हुए होंगेजितना वह हो गया था न्योछावरशीशे पर अक्षरों और चित्रों को उड़ते देखगाड़ी के इंजन की ध्वनि सुनउसके भीतर की प्रणालियाँ चल पड़तींवह दौड़ता हुआ गेट पर टंग जाताजब तक गाड़ी न जाती, वह भी न जाताऔर समूचे दृश्य मेंवह खुद एक गेट हो जाताजीवन के दो वर्गों के बीचबोली में पत्थर और पहनावे से धूसरउसकी आँखों में अचरज नदी की तरह बहतामिट्टी के मकान से आया वह मिट्टी सा लड़काहवा की नींव में जड़ों सा फैल जाताउसकी हँसी मेंपगडंडियों पर घूमते टायर जैसा असंतुलन थाडंडे की मार से उड़ी गिल्ली सा उच्छल पन थाचाल में नवजात बछड़े सी फुर्ती थीबातों में अमर बेल सी जटिलतागिलहरी सी तेज़ी जवाबों मेंक़िस्सों में देहाती मसखरी थीबूढ़ों की खैनी बीड़ी थीकिशोरों की चुहल थीफसलों की सिंचाई थीत्योहारों के गीत थेसमूचा जगत था आसपासउसके होने सेनहीं था तो वह स्वयं परिणतअपने उस लोक कोअपनी दुनिया की खपरैल से फाँदता आ पहुँचा थाइस दूसरी दुनिया की दहलीज़ तकजाना नही चाहता था वह वापसउसकी विनत आँखें तत्पर थींहर सम्भव कोशिश कोकरा लेते चाहे जो भी कामन भी होते वाजिब दामबस रहना था उसेतथाकथित ‘नगर’ मेंअंतिम दिन उसकी चाल मेंदिखा था अभाव सदियों कामुड़-मुड़ कर देखता रहा वहहाय जो रुक न सका !बेमन लौटी उसकी भंगिमाअब भी है मेरे भीतरदौड़ती कूदती हँसती चिल्लातीकई अबूझ प्रश्न पूछतीफिर कहीं छिप-छिप जाती ।
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Lok Jagat Ka Ladka | Devansh Ekant
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