EPISODE · Jan 20, 2026 · 2 MIN
Ma Aur Aag | Vishwanath Prasad Tiwari
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
माँ और आग। विश्वनाथ प्रसाद तिवारीयह उस समय की बात हैजब माचिस का आविष्कार नहीं हुआ थामाँ थोड़ी-सी आग जलाकर रख देतीसवेरे रोटी सेंकने के लिएरात को जब सभी सो जातेमाँ आग को ऐसे ढककर छिपातीएक कोने मेंजैसे कोई रतन हो अमोलजैसे कोई शिशु हो मुलायमजैसे कोई दुल्हन हो लाल-लालमेघ गरजते थे रातों कोकड़कती थी बिजलीखेतों में फेंकरते थे सियारऔर गलियों में रोते थे कुत्तेहम डर से चिपक जातेमाँ की गोद मेंउस अँधेरे की जंग मेंमाँ के लिए कवच-कुंडल थी आगराख से लिपटीमाँ के दिल की तरह धुकधुकातीमाँ के सपनों-सी दहकतीमाँ की इच्छाओं-सी सुलगतीमाँ हमें ढाढ़स देती -‘घर में आग हैतो कोई नहीं आ सकता भूत-प्रेत’अँधेरे में वह धीरे से उठतीआग को और सावधानी सेछिपा देती राख मेंजैसे अपने आँचल से ढककर हमें दूध पिला रही हो।
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