EPISODE · Nov 21, 2025 · 1 MIN
Ma | Srinaresh Mehta
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
माँ । श्रीनरेश मेहतामैं नहीं जानताक्योंकि नहीं देखा है कभी—पर, जो भीजहाँ भी लीपता होता हैगोबर के घर-आँगन,जो भीजहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता हैआटे-कुंकुम से अल्पना,जो भीजहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता हैमेथी की भाजी,जो भीजहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता हैदूर तक का पथ -वही,हाँ, वही है माँ!!
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माँ । श्रीनरेश मेहता मैं नहीं जानता क्योंकि नहीं देखा है कभी— पर, जो भी जहाँ भी लीपता होता है गोबर के घर-आँगन, जो भी जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है आटे-कुंकुम से अल्पना, जो भी जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है मेथी की भाजी, जो भी जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता है दूर तक का पथ - वही, हाँ, वही है माँ!!
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