EPISODE · Apr 2, 2025 · 3 MIN
Manikarnika Ka Bashinda | Gyanendrapati
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
मणिकर्णिका का बाशिंदा | ज्ञानेन्द्रपति साढ़े तीन टाँगों वाला एक कुत्तामणिकर्णिका का स्थायी बाशिंदा हैलकड़ी की टालों और चायथानों वालों से हिलगायह नहीं कि दुत्कारा नहीं जाता वहलेकिन हमेशा दूर-दूर रखने वाली दुर-दुरनहीं भुगतता वह यहाँ विकलांगता के बावजूद विकल नहीं रहता यहाँसाढ़े तीन टाँगों वाला वह भूरा कुत्तातनिक उदास ऑँखों से मानुष मन को थाहता-साइधर से उधर आता-जाता हैबीच-बीच में यहाँ-वहाँ मिल जाता हैअपनी दयनीयता मेंअपने इलाके में होने की अकड़ छुपायेकाठ का भरम देती, कंक्रीट की बनीदो बेंचों परहम बैठे हैं।शवसंगी आज, मणिकर्णिका परउधर चिताग्नि ने लहक पा ली है।हाल की बनी हैंये बेंचें, नगर निगम ने लगवाईं'सुविधाओं में इज़ाफ़ा' जिसे कहा जा रहा हैदिनोदिन कठिन होते जा रहे जिस नगर में देवों को भी तंगी में काम चलाना पड़ रहा हैजहाँमहादेव के नगर मेंएक टूटी छूटी साँसों वाले के संगअपनी साँसें जोड़ते यहाँ तक आने वालों के लिएथकी देह ढीलने लायक ज़रा-सा इत्मीनान जहाँहालांकि पूरे ध्यान से कान लगाने पर भीसुनायी नहीं पड़ता तारक मन्त्र का एक भी अक्षरमुक्तिकामी शव के कानों में जिसेशिव फुसफुसाते हैंकि तभी, ध्यान बँटाताएक बार फिरगुज़रता है साढ़े तीन टाँगों वालामणिकर्णिका का स्थायी बाशिंदा वह कुत्ता अपनी फुदक में हवा में झूलती अधकटी टाँग से निरक्षर फुसफुसातासा : मुझसे पूछो, ज़िंदगी की बेअन्त जंगमता में मृत्यु अल्पविराम है सिर्फ़उसकी लपलपाती जीभ हाँफती होती है दरअसलमहाजीवन के गति-चक्र में सब बँधे हैं -शिव हों कि श्वान
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