Meera Majumdar Ka Kehna Hai | Kumar Vikal episode artwork

EPISODE · Feb 2, 2025 · 3 MIN

Meera Majumdar Ka Kehna Hai | Kumar Vikal

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

मीरा मजूमदार का कहना है | कुमार विकलसामने क्वार्टरों में जो एक बत्ती टिमटिमाती हैवह मेरा घर हैइस समय रात के बारह बज चुके हैंमैं मीरा मजूमदार के साथमार्क्सवाद पर एक शराबी बहस करके लौटा हूँऔर जहाँ से एक औरत के खाँसने की आवाज़ आ रही हैवह मेरा घर हैमीरा मजूमदार का कहना हैकि इन्क़लाब के रास्ते पर एक बाधा मेरा घर हैजिसमें खाँसती हुई एक बत्ती हैकाँपता हुआ एक डर हैइन्क़लाब मीरा की सबसे बड़ी हसरत हैलेकिन उसे अँधेरे क्वार्टरोंखाँसती हुई बत्तियों से बहुत नफ़रत हैवह ख़ुद खनकती हुई एक हँसी हैजो रोशनी की एक नदी की तरह बहती हैलेकिन अपने आपकोगुरिल्ला नदी कहती हैमीरा मजूमदार इन्क़लाबी दस्तावेज़ हैपार्टी की मीटिंग का नया गोलमेज़ हैमीरा मजूमदार एक क्रांतिकारी कविता हैअँधेरे समय की सुलगती हुई सविता हैउसकी हँसी में एक जनवादी आग हैजिससे इन्क़लाबी अपनी सिगरेटें सुल्गाते हैंइन्क़लाब के रास्ते को रोशन बनाते हैंमैंने भी आज उसकी जनवादी आग सेअधजले सिगरेट का एक टुकड़ा जलाया थाऔर जैसे ही मैंने उसे उँगलियों में दबाया थाझट से मुझे अपना क्वार्टर याद आया थामीरा मजूमदार तब—मुझको समझाती है.मेरे विचारों में बुनियादी भटकाव हैकथनी और करनी का गहरा अलगाव हैमेरी आँखों में जो एक बत्ती टिमटिमाती हैमेरी क्रांति—दृष्टि को वह धुँधला बनाती हैऔर जब भी मेरे सामनेकोई ऐसी स्थिति आती है—एक तरफ़ क्रांति है और एक तरफ़ क्वार्टर हैमेरी नज़र सहसा क्वार्टर की ओर जाती है

मीरा मजूमदार का कहना है | कुमार विकलसामने क्वार्टरों में जो एक बत्ती टिमटिमाती हैवह मेरा घर हैइस समय रात के बारह बज चुके हैंमैं मीरा मजूमदार के साथमार्क्सवाद पर एक शराबी बहस करके लौटा हूँऔर जहाँ से एक औरत के खाँसने की आवाज़ आ रही हैवह मेरा घर हैमीरा मजूमदार का कहना हैकि इन्क़लाब के रास्ते पर एक बाधा मेरा घर हैजिसमें खाँसती हुई एक बत्ती हैकाँपता हुआ एक डर हैइन्क़लाब मीरा की सबसे बड़ी हसरत हैलेकिन उसे अँधेरे क्वार्टरोंखाँसती हुई बत्तियों से बहुत नफ़रत हैवह ख़ुद खनकती हुई एक हँसी हैजो रोशनी की एक नदी की तरह बहती हैलेकिन अपने आपकोगुरिल्ला नदी कहती हैमीरा मजूमदार इन्क़लाबी दस्तावेज़ हैपार्टी की मीटिंग का नया गोलमेज़ हैमीरा मजूमदार एक क्रांतिकारी कविता हैअँधेरे समय की सुलगती हुई सविता हैउसकी हँसी में एक जनवादी आग हैजिससे इन्क़लाबी अपनी सिगरेटें सुल्गाते हैंइन्क़लाब के रास्ते को रोशन बनाते हैंमैंने भी आज उसकी जनवादी आग सेअधजले सिगरेट का एक टुकड़ा जलाया थाऔर जैसे ही मैंने उसे उँगलियों में दबाया थाझट से मुझे अपना क्वार्टर याद आया थामीरा मजूमदार तब—मुझको समझाती है.मेरे विचारों में बुनियादी भटकाव हैकथनी और करनी का गहरा अलगाव हैमेरी आँखों में जो एक बत्ती टिमटिमाती हैमेरी क्रांति—दृष्टि को वह धुँधला बनाती हैऔर जब भी मेरे सामनेकोई ऐसी स्थिति आती है—एक तरफ़ क्रांति है और एक तरफ़ क्वार्टर हैमेरी नज़र सहसा क्वार्टर की ओर जाती है

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Meera Majumdar Ka Kehna Hai | Kumar Vikal

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This episode was published on February 2, 2025.

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मीरा मजूमदार का कहना है | कुमार विकलसामने क्वार्टरों में जो एक बत्ती टिमटिमाती हैवह मेरा घर हैइस समय रात के बारह बज चुके हैंमैं मीरा मजूमदार के साथमार्क्सवाद पर एक शराबी बहस करके लौटा हूँऔर जहाँ से एक औरत के खाँसने की आवाज़ आ रही हैवह मेरा घर हैमीरा...

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