EPISODE · Apr 24, 2026 · 2 MIN
Mere Naseeb ka Likha | Shayar Jamali
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
मिरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था । शायर जमालीमेरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता थावो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता थाये तू ने ठीक किया अपना हाथ खींच लियामेरे लबों से तिरा हाथ जल भी सकता थाउड़ाती रहती है दुनिया ग़लत-सलत बातेंवो संग-दिल* था तो इक दिन पिघल भी सकता थासंग-दिल: पत्थर दिल उतर गया तिरा ग़म रूह की फ़ज़ाओं मेंरगों में होता तो आँखों से ढल भी सकता थामैं ठीक वक़्त पे ख़ामोश हो गया वर्नामिरे रफ़ीक़ों* का लहज़ा बदल भी सकता थारफ़ीक़: साथ रहने वालेअना को धूप में रहना पसंद था वर्नातेरे ग़ुरूर का सूरज तो ढल भी सकता थारगड़ सकी न मिरी प्यास एड़ियाँ वर्नाहर एक ज़र्रे से चश्मा* उबल भी सकता थाचश्मा: झरनापसंद आई न टूटी हुई फ़सील की राहमैं शहर-ए-तन* की घुटन से निकल भी सकता थाशहर-ए-तन: बदनवो लम्हा जिस ने मुझे रेज़ा-रेज़ा* कर डालाकिसी के बस में जो होता तो टल भी सकता थारेज़ा-रेज़ा: टुकड़े-टुकड़े
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Mere Naseeb ka Likha | Shayar Jamali
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