EPISODE · Nov 8, 2023 · 3 MIN
Meri Bansuri Meri Bhasha Hai | Shahanshah Alam
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
मेरी बाँसुरी मेरी भाषा है | शहंशाह आलम | शहंशाह आलमसुबह उठा तो देर शाम को घर पहुँचा सूरजचाँद था कि रात भर जागा क़बीले में अथकहम दिन भर शहरी हुए और रात को आदिवासीयह मेरी भाषा की आवाज़ थी जो पहुँच रही थीआदमी के झुंड में पूरी तरह साफ़ सुनी जाने वालीइतनी साफ़ भाषा कि हम लड़ सकें अपने शत्रुओं सेमेरी भाषा मेरी बाँसुरी है और बाँसुरी मेरी आवाज़इसी भाषा के सहारे बादलों पर चलता-फिरता हुआतुम तक पहुँचता रहा था पुराना परिचित बनकरआम के पकने और शहद के मीठे होने वाले इन दिनों में उदासी कहाँ थी मेघ के चेहरे पर पिछले कई माह वालीउदासी को तुम्हारे अलावा कौन अपना मान सकता हैसहस्र बार तुम्हारे घर गया पूर्णिमा वाला उदित मेरा चाँदतुम्हारे कहने से ताकि तुम मुझे रोक लो यात्रा पर जाने सेऔर मैं जितना कविता में कह लेता था बुद्ध बनकरतुम्हारे समक्ष कहाँ सुना पाता था कोई मार्मिक वृत्तांतएक सच यह भी था कि हमने कितने-कितने जीवाश्मइकट्ठा किए साथ रहकर उस टेढ़े-मेढ़े गुप्त सुरंग मेंमेरा निरापद, सरल और प्राचीन प्रेम भी जीवाश्म ठहराअगर तुम मानते हो प्रेम को पूर्ण प्रेम भाषा को पूर्ण भाषा अगर तुम जकड़ लेते अपने आलिंगनपाश में बारिश वाली रातमेरी बाँसुरी की आवाज़ को प्रेम की नई खोज स्वीकारतेअपनी सहस्र यात्राएँ पूरी कर लौट आता तुम्हारे समय के सच में।
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