EPISODE · Oct 3, 2024 · 2 MIN
Mukti | Kedarnath Singh
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
मुक्ति | केदारनाथ सिंहमुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिलामैं लिखने बैठ गया हूँमैं लिखना चाहता हूँ 'पेड़'यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना हैमैं लिखना चाहती हूँ ‘पानी’'आदमी' 'आदमी' मैं लिखना चाहता हूँएक बच्चे का हाथएक स्त्री का चेहरामैं पूरी ताक़त के साथशब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ़यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगामें भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाकाजो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता हैयह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगामैं लिखना चाहता हूँ
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