EPISODE · Jun 29, 2026 · 2 MIN
Parantu | Kumar Ambuj
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
परंतु । कुमार अम्बुजबुद्धिजीवी भी सड़क पर आ सकते हैंपरंतु क्या करें यह सरकार ठीक नहीं हैमाना कि यह लोकतंत्र हैऔर हम सुधारना चाहते हैं यह समाजपरंतु इधर ठाकुरों के वोट बहुत हैंबेचारा ज़िला दंडाधिकारी भीकरना तो चाहता है कुछ हस्तक्षेपपरंतु उसके अधिकारों में भीनिर्बल को ही दंडित कर सकना सीमित हैकहते हैं कि इस देश में कई लोग हैं दयालुपरंतु उनकी संपन्नता से ज़ाहिर हो जाती है उनकी क्रूरतायों तो मैं ख़ुश हूँपरंतु मुझे शर्म आती हैअपनी समकालीन कायरता परमैं शब्दों से काम चलाता हूँपरंतु मुझे अब कुछ दूसरे औज़ार भी लगेंगेपरंतु संकल्प की कृशकायानामालूम खाई की तरफ़ लिए ही चली जाती हैविचार मेरे पास श्रेष्ठ हैपरंतु पराजित होता हुआरोज़-रोज़ वह अल्पसंख्यक होता जाता हैसोचता हूँ उसे रखना होगा जीवितपरंतु हम सबको मिल कर हीजो धीरे-धीरे अब बहुत अकेले हैं।
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