Parinde Par Kavi Ko Pehchante Hain | Rajesh Joshi episode artwork

EPISODE · Jul 2, 2024 · 3 MIN

Parinde Par Kavi Ko Pehchante Hain | Rajesh Joshi

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

परिन्दे पर कवि को पहचानते हैं - राजेश जोशी सालिम अली की क़िताबें पढ़ते हुएमैंने परिन्दों को पहचानना सीखा।और उनका पीछा करने लगापाँव में जंज़ीर न होती तो अब तक तो .न जाने कहाँ का कहाँ निकल गया होताहो सकता था पीछा करते-करते मेरे पंख उग आतेऔर मैं उड़ना भी सीख जाताजब परिन्दे गाना शुरू करतेंऔर पहाड़ अँधेरे में डूब जाते।ट्रक ड्राइवर रात की लम्बाई नापने निकलतेतो अक्सर मुझे साथ ले लेतेमैं परिन्दों के बारे में कई कहानियाँ जानता थामुझे किसी ने बताया था कि जिनके पास पंख नहीं होतेऔर जिन्हें उड़ना नहीं आतावे मन-ही-मन सबसे लम्बी उड़ान भरते हैंइसलिए रास्तों में जो जान-पहचानवाले लोग मिलतेमुझसे हमेशा परिन्दों की कहानियाँ सुनाने को कहतेदोस्त जब पूछते थे तो मैं अक्सर कहता थामुझे चिट्ठी मत लिखनापरिन्दों का पीछे करनेवाले काकोई स्थायी पता नहीं होतामुझे क्या ख़बर थी कि एक दिन ऐसा आएगाजब चिट्ठी लिखने का चलन ही अतीत हो जाएगान जाने किन कहानियों से उड़ान भरतेकुछ अजीब-से परिन्दे हमारे पास आते थेजो गाते-गाते एक लपट में बदल जातेऔर देखते-देखते राख हो जातेपर एक दिन बरसात आतीऔर वे अपनी ही राख से फिर पैदा हो जातेपता नहीं हमारे आकाश में उड़नेवाले परिन्दे कहानियों से निकलकर आए परिन्दों के बारे मेंकुछ जानते थे या नहीं...उनकी आँख देखकर लेकिन लगता थाकि उन कवियों को परिन्दे पर जानते हैंजो क़ुक़्नुस जैसे हज़ारों काल्पनिक परिन्दों की -कहानियाँ बनाते हैं ।पाँव में ज़ंजीर न होती तो शायदएक न एक दिन मैं भी किसी कवि के हत्थे चढ़करऐसे ही किसी परिन्दे में बदल गया होता!

परिन्दे पर कवि को पहचानते हैं - राजेश जोशी सालिम अली की क़िताबें पढ़ते हुएमैंने परिन्दों को पहचानना सीखा।और उनका पीछा करने लगापाँव में जंज़ीर न होती तो अब तक तो .न जाने कहाँ का कहाँ निकल गया होताहो सकता था पीछा करते-करते मेरे पंख उग आतेऔर मैं उड़ना भी सीख जाताजब परिन्दे गाना शुरू करतेंऔर पहाड़ अँधेरे में डूब जाते।ट्रक ड्राइवर रात की लम्बाई नापने निकलतेतो अक्सर मुझे साथ ले लेतेमैं परिन्दों के बारे में कई कहानियाँ जानता थामुझे किसी ने बताया था कि जिनके पास पंख नहीं होतेऔर जिन्हें उड़ना नहीं आतावे मन-ही-मन सबसे लम्बी उड़ान भरते हैंइसलिए रास्तों में जो जान-पहचानवाले लोग मिलतेमुझसे हमेशा परिन्दों की कहानियाँ सुनाने को कहतेदोस्त जब पूछते थे तो मैं अक्सर कहता थामुझे चिट्ठी मत लिखनापरिन्दों का पीछे करनेवाले काकोई स्थायी पता नहीं होतामुझे क्या ख़बर थी कि एक दिन ऐसा आएगाजब चिट्ठी लिखने का चलन ही अतीत हो जाएगान जाने किन कहानियों से उड़ान भरतेकुछ अजीब-से परिन्दे हमारे पास आते थेजो गाते-गाते एक लपट में बदल जातेऔर देखते-देखते राख हो जातेपर एक दिन बरसात आतीऔर वे अपनी ही राख से फिर पैदा हो जातेपता नहीं हमारे आकाश में उड़नेवाले परिन्दे कहानियों से निकलकर आए परिन्दों के बारे मेंकुछ जानते थे या नहीं...उनकी आँख देखकर लेकिन लगता थाकि उन कवियों को परिन्दे पर जानते हैंजो क़ुक़्नुस जैसे हज़ारों काल्पनिक परिन्दों की -कहानियाँ बनाते हैं ।पाँव में ज़ंजीर न होती तो शायदएक न एक दिन मैं भी किसी कवि के हत्थे चढ़करऐसे ही किसी परिन्दे में बदल गया होता!

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Parinde Par Kavi Ko Pehchante Hain | Rajesh Joshi

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This episode was published on July 2, 2024.

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परिन्दे पर कवि को पहचानते हैं - राजेश जोशी सालिम अली की क़िताबें पढ़ते हुएमैंने परिन्दों को पहचानना सीखा।और उनका पीछा करने लगापाँव में जंज़ीर न होती तो अब तक तो .न जाने कहाँ का कहाँ निकल गया होताहो सकता था पीछा करते-करते मेरे पंख उग आतेऔर मैं उड़ना...

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