EPISODE · May 20, 2026 · 2 MIN
Parvat Pradesh Mein Pavas | Sumitranandan Pant
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
पर्वत प्रदेश में पावस । सुमित्रानंदन पंतपावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।मेखलाकार पर्वत अपारअपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,अवलोक रहा है बार-बारनीचे जल में निज महाकार,- जिसके चरणों में पला तालदर्पण-सा फैला है विशाल!गिरी का गौरव गाकर झर-झरमद में नस-नस उत्तेजित करमोती की लड़ियों-से सुंदरझरते हैं झाग भरे निर्झर!गिरिवर के उर से उठ-उठ करउच्चाकांक्षाओं से तरुवरहै झाँक रहे नीरव नभ परअनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।उड़ गया,अचानक लो,भूधरफड़का अपार पारद1 के पर!रव-शेष रह गए हैं निर्झर!है टूट पड़ा भू पर अंबर!धँस गए धरा में सभय शाल!उठ रहा धुआँ,जल गया ताल!- यों जलद-यान में विचर-विचरथा इंद्र खेलता इंद्रजाल।
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पर्वत प्रदेश में पावस । सुमित्रानंदन पंतपावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।मेखलाकार पर्वत अपारअपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,अवलोक रहा है बार-बारनीचे जल में निज महाकार,- जिसके चरणों में पला तालदर्पण-सा फैला है विशाल!गिरी का गौरव गाकर झर-झरमद में नस-नस उत्तेजित करमोती की लड़ियों-से सुंदरझरते हैं झाग भरे निर्झर!गिरिवर के उर से उठ-उठ करउच्चाकांक्षाओं से तरुवरहै झाँक रहे नीरव नभ परअनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।उड़ गया,अचानक लो,भूधरफड़का अपार पारद1 के पर!रव-शेष रह गए हैं निर्झर!है टूट पड़ा भू पर अंबर!धँस गए धरा में सभय शाल!उठ रहा धुआँ,जल गया ताल!- यों जलद-यान में विचर-विचरथा इंद्र खेलता इंद्रजाल।
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