EPISODE · Mar 23, 2024 · 2 MIN
Peet Kamal | Nandkishore Acharya
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
पीत कमल | नन्दकिशोर आचार्य जल ही जल की नीली-दर-नीली गहराई के नीचे जमे हुए काले दलदल ही दलदल में अपनी ही पूँछ पर सर टिका कर सो रहा था वह : उचटा अचानक भूला हुआ कुछ कहीं जैसे सुगबुगाने लगे।कुछ देर उन्मन, याद करता-सा उसी बिसरी राग की धुन जल के दबावों में कहीं घुटती हुईएक-एक कर लगीं खुलने सलवटें सारीतरंग-सी व्याप गयी जल में : अपनी ही पूँछ के बल खड़ा झूमता था वह फण खिला था राग की मानिन्द ।ऊपर जल की नीली गहराई में से फूट-फूट आते थेपीत कमल !
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Peet Kamal | Nandkishore Acharya
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