EPISODE · Jul 16, 2026 · 1 MIN
Phir Kahe Ki Dooriyan | Anwar Suhail
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
फिर काहे की दूरियाँ । अनवर सुहैलदेखकर मुझको तुम्हें याद आती बिरयानी कीमिलकर मुझसे बातें करते शराब-शबाब से लबरेज़ ग़ज़लों कीतुम्हारे संवाद में अचानक उर्दू कुछ ज़्यादा आ जातीऔर अपने उर्दू ज्ञान से प्रभावित करने के लिएकहते मुझे जनाब की जगह ‘ख़ुदा-हाफ़िज़’जबकि मैं तुम्हारी तरह इसी मिट्टी की उपज हूँउतना ही हिंदी, उतना ही देसी, उतना ही देहाती जितने तुमफिर मुझे क्यों देखते हो एक परदेसी की तरहमैं कोई एलियन नहीं हूँ भाईखान-पान, बरत-त्यौहार, रीत-रिवाज अलग होते हुए भीकितने एक से हैं...देखो न,बेटियाँ बिदा के वक़्त रोती हैं तुम्हारे यहाँऔर भर आती हैं आँखें लड़के वालों की भीहमारे यहाँ भी तो ऐसा ही होता है भाईफिर काहे का अंतर...फिर काहे की दूरियाँ...
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