Pita Ka Hatyara | Madan Kashyap episode artwork

EPISODE · Sep 21, 2025 · 5 MIN

Pita Ka Hatyara | Madan Kashyap

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

पिता का हत्यारा | मदन कश्यप उसके हाथ में एक फूल होता हैजो मुझे चाकू की तरह दिखता हैसच तो यह है कि वह चाकू ही होता हैजो कैमरों में फूल जैसा दिखता हैऔर उन तमाम लोगों को भी फूल ही दिखता हैजो अपनी आँखों से नहीं देखतेवह मेरे पिता का हत्यारा हैरोज़ ही मिलता हैटेलेविज़न चैनलों और अख़बारों में ही नहींकभी-कभारसड़कों परआमने-सामने भीमैं इतना डर जाता हूँकि डरा हुआ नहीं होने का नाटक भी नहीं कर पाताचौदह वर्ष का था जब पिता की हत्या हुई थीपिछले तीन वर्षों से बस यही सीख रहा हूँकि जीने के लिए कितना ज़रूरी है मरनापिता का शव अस्पताल से घर आया थातब मुझे ठीक से पता भी नहीं था कि उनकी हत्या हुई है।हमें बताया गया था वे एक पार्टी में गये थेऔर अचानक उनके ह्रदय की गति रुक गयीतीसरे दिन हत्यारे के आ धमकने के बाद ही पता चलाकि उनकी हत्या हुई थीउसके आने से पहले चेतावनियाँ आने लगी थींधमकियाँ पहुँचने लगी थींयह प्रलोभन भी कि मैं जी सकता हूँजैसे पिता भी चाहते तो जी सकते थेबिल्कुल मेरे घर वह अकेले ही आयासफेद कपड़ों में निहत्था एक तन्दुरुस्त आदमीउसने अंगरक्षकों को कुछ पीछे औरअपने समर्थकों को कुछ और अधिक पीछे रोक दिया थामेरे माथे पर हाथ फेरालगा जैसे चमड़े सहित मेरे बाल नुच जायेंगेसिसकते हुए मैं अपने गालों पर लुढ़क रहेआँसुओं को छूकर आश्वस्त हुआवह ख़ून की धार नहीं थीवह बिना किसी आग्रह के बैठ गयाऔर हमारे ही घर में हमें बैठने का इशारा कियाफिर धीरे-धीरे बोलने लगामानो मुझसे या मेरी माँ से नहींकिसी अदृश्य से बातें कर रहा होकरनी पड़ती हैहत्या भी करनी पड़ती है।तुम बच्चे हो और तुम्हारी माँ एक विधवाधीरे-धीरे सब समझ जाओगेमैं समझता हूँ तुम अभी जीना चाहते होऔर मैं भी इस मामले को यहीं ख़त्म कर देना चाहता हूँयह इकलौती नहीं हैऔर भी हत्याएँ हैं और भी हत्याएँ होनी हैंतुम्हें साफ-साफ बता दूँकि हत्या मेरी मजबूरी या ज़रूरत भर नहीं है।वे और हैं जो राजनीति के लिए हत्याएँ करते हैंमैं हत्या के लिए राजनीति करता हूँहत्या को संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनाकरतमाम विवादों - बहसों को ख़त्म कर दूँगा एक साथऔर जाते-जाते तुम्हें साफ-साफ बता दूँतुम्हारे पिता की हत्या ही हुई थीक्योंकि वह मुझे हत्यारा सिद्ध करने की ज़िद नहीं छोड़ रहे थेअब तुम ऐसी कोई ज़िद मत पालनावह चला गया तब कैमरेवाले आयेमैंने साफ-साफ कहा मेरे पिता की हत्या नहीं हुई थीवह स्वाभाविक मौत थी ज़्यादा से ज़्यादा दुर्घटना कह सकते हैंफिर मैंने स्कूल में अपने साथियों को ही नहींसड़क के राहगीरों और पड़ोसियों को ही नहींघर में अपने दादाजी को भी बतायामेरे पिता की हत्या नहीं हुई थीबस एक वही थे जो मान नहीं रहे थेऔर एक दिन तो मैं सपने में चिल्ला उठानहीं-नहीं मेरे पिता की हत्या नहीं हुई थी!

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