EPISODE · Jul 8, 2025 · 2 MIN
Puri ka Samudra | Gyanendrapati
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
पुरी का समुद्र | ज्ञानेन्द्रपतिआँखों में पुरी का समुद्र लिये जब लौटोगीविस्मय -विस्फारित अपनी बड़री आँखों मेंतरंग-विकल वह संयम-असमर्थ समुद्रपछाड़ खाता, पुकारता, लीलने को आताउद्द्वेलित, उद्दाम, हहातादष्टि-छोर तक फेला, फूला, फेनिलटूट-टूट बिखर, तुम्हारे पैरों तले बिछ जातातुम्हें छोड़ जाता हुआ कुछ-कुछ गीला, कुछ-कुछ भीततुम्हारे कन्धों पर रख हाथ, तुम्हारी आँखों में झाँकतामैं जानूँगा, अरे! यह तो मेरे मन का प्रतिबिम्ब है।
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Puri ka Samudra | Gyanendrapati
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