EPISODE · Aug 17, 2025 · 4 MIN
Raat Kisi Ka Ghar Nahi | Rajesh Joshi
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
रात किसी का घर नहीं | राजेश जोशीरात गए सड़कों पर अक्सर एक न एक आदमी ऐसा ज़रूर मिल जाता हैजो अपने घर का रास्ता भूल गया होता हैकभी-कभी कोई ऐसा भी होता है जो घर का रास्ता तो जानता हैपर अपने घर जाना नहीं चाहताएक बूढ़ा मुझे अक्सर रास्ते में मिल जाता हैकहता है कि उसके लड़कों ने उसे घर से निकाल दिया है।कि उसने पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया है।लड़कों के बारे में बताते हुए वह अक्सर रुआँसा हो जाता हैऔर अपनी फटी हुई क़मीज़ को उघाड़करमार के निशान दिखाने लगता हैकहता है उसने बचपन में भी अपने बच्चों परकभी हाथ नहीं उठायालेकिन उसके बच्चे उसे हर दिन पीटते हैंकहता है कि वह अब कभी लौटकरअपने घर नहीं जाएगालेकिन थोड़ी देर बाद ही उसे लगता है कि उसने यूँ हीग़ुस्से में बोल दिया था यह वाक़्यअपमान पर हावी होने लगती एक अनिश्चितताएक भय अचानक घिरने लगता है मन मेंथोड़ी देर बाद वह अपने आप से ही हार जाता हैदूसरे ही पल वह कहता हैकि अब इस उम्र में वह कहाँ जा सकता हैवह चाहता है, मैं उसके लड़कों को जाकर समझाऊँकि लड़के उसे वापस घर में आ जाने देंकि वह चुपचाप एक कोने में पड़ा रहेगाकि वह बाज़ार के छोटे-मोटे काम भी कर दिया करेगाबच्चों को स्कूल से लाने ले जाने का काम तोवह करता ही रहा है कई साल सेवह चुप हो जाता है थक कर बैठ जाता हैजैसे ही लगता है कि उसकी बात पूरी हो चुकी हैवह फिर बोल पड़ता है कहता है : मैं बूढ़ा हो गया हूँकभी-कभी चिड़चिड़ा जाता हूँसारी ग़लती लड़कों की ही नहीं हैवे मन के इतने बुरे भी नहीं हैंहालात ही इतने बुरे हैं, उनका भी हाथ तंग रहता हैउनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और वो मुझे बहुत प्यार करते हैंमेरा तो पूरा समय उन्हीं के साथ बीत जाता हैफिर अचानक वह खड़ा हो जाता है कहता हैहो सकता है वे मुझे ढूँढ़ रहे होंउनमें से कोई न कोई थोड़ी देर में ही मुझे लिवाने आ जाएगाआप अगर मेरे लड़कों में से किसी को जानते होंतो उससे कुछ मत कहिएगासब ठीक हो जाएगा...सब ठीक हो जाएगा...बुदबुदाते हुए वह आगे चल देता हैरात किसी का घर नहीं होतीकिसी बेघर के लिएकिसी घर से निकाल दिए गए बूढ़े के लिएमेरे जैसे आवारा के लएरात किसी का घर नहीं होतीउसके अँधेरे में आँसू तो छिप सकते हैं कुछ देरलेकिन सिर छिपाने की जगह वह नहीं देतीमैं उस बूढ़े से पूछना चाहता हूँपर पूछ नहीं पाताकि जिस तरफ़ वह जा रहा हैक्या उस तरफ़ उसका घर है?
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रात किसी का घर नहीं | राजेश जोशीरात गए सड़कों पर अक्सर एक न एक आदमी ऐसा ज़रूर मिल जाता हैजो अपने घर का रास्ता भूल गया होता हैकभी-कभी कोई ऐसा भी होता है जो घर का रास्ता तो जानता हैपर अपने घर जाना नहीं चाहताएक बूढ़ा मुझे अक्सर रास्ते में मिल जाता हैकहता है कि उसके लड़कों ने उसे घर से निकाल दिया है।कि उसने पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया है।लड़कों के बारे में बताते हुए वह अक्सर रुआँसा हो जाता हैऔर अपनी फटी हुई क़मीज़ को उघाड़करमार के निशान दिखाने लगता हैकहता है उसने बचपन में भी अपने बच्चों परकभी हाथ नहीं उठायालेकिन उसके बच्चे उसे हर दिन पीटते हैंकहता है कि वह अब कभी लौटकरअपने घर नहीं जाएगालेकिन थोड़ी देर बाद ही उसे लगता है कि उसने यूँ हीग़ुस्से में बोल दिया था यह वाक़्यअपमान पर हावी होने लगती एक अनिश्चितताएक भय अचानक घिरने लगता है मन मेंथोड़ी देर बाद वह अपने आप से ही हार जाता हैदूसरे ही पल वह कहता हैकि अब इस उम्र में वह कहाँ जा सकता हैवह चाहता है, मैं उसके लड़कों को जाकर समझाऊँकि लड़के उसे वापस घर में आ जाने देंकि वह चुपचाप एक कोने में पड़ा रहेगाकि वह बाज़ार के छोटे-मोटे काम भी कर दिया करेगाबच्चों को स्कूल से लाने ले जाने का काम तोवह करता ही रहा है कई साल सेवह चुप हो जाता है थक कर बैठ जाता हैजैसे ही लगता है कि उसकी बात पूरी हो चुकी हैवह फिर बोल पड़ता है कहता है : मैं बूढ़ा हो गया हूँकभी-कभी चिड़चिड़ा जाता हूँसारी ग़लती लड़कों की ही नहीं हैवे मन के इतने बुरे भी नहीं हैंहालात ही इतने बुरे हैं, उनका भी हाथ तंग रहता हैउनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और वो मुझे बहुत प्यार करते हैंमेरा तो पूरा समय उन्हीं के साथ बीत जाता हैफिर अचानक वह खड़ा हो जाता है कहता हैहो सकता है वे मुझे ढूँढ़ रहे होंउनमें से कोई न कोई थोड़ी देर में ही मुझे लिवाने आ जाएगाआप अगर मेरे लड़कों में से किसी को जानते होंतो उससे कुछ मत कहिएगासब ठीक हो जाएगा...सब ठीक हो जाएगा...बुदबुदाते हुए वह आगे चल देता हैरात किसी का घर नहीं होतीकिसी बेघर के लिएकिसी घर से निकाल दिए गए बूढ़े के लिएमेरे जैसे आवारा के लएरात किसी का घर नहीं होतीउसके अँधेरे में आँसू तो छिप सकते हैं कुछ देरलेकिन सिर छिपाने की जगह वह नहीं देतीमैं उस बूढ़े से पूछना चाहता हूँपर पूछ नहीं पाताकि जिस तरफ़ वह जा रहा हैक्या उस तरफ़ उसका घर है?
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Raat Kisi Ka Ghar Nahi | Rajesh Joshi
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