EPISODE · May 11, 2025 · 2 MIN
Us Din | Rupam Mishra
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
उस दिन | रूपम मिश्र उस दिन कितने लोगों से मिली कितनी बातें , कितनी बहसें कींकितना कहा ,कितना सुनासब ज़रूरी भी लगा था पर याद आते रहे थे बस वो पल जितनी देर के लिए तुमसे मिली विदा की बेला में हथेली पे धरे गये ओठ देह में लहर की तरह उठते रहे कदम बस तुम्हारी तरफ उठना चाहते थे और मैं उन्हें धकेलती उस दिन जाने कहाँ -कहाँ भटकती रही वे सारी जगहें मेरी नहीं थीं मेरी जगह मुझसे छूट गयी थीतो बचे हुए रेह से जीवन में क्या रंग भरतीहवा में जैसे राख ही राख उड़ रही थी जिसकी गर्द से मेरी साँसे भरती जा रही थींवहाँ वे भी थे जिनसे मैं अपना दुःख कह सकती थीलेकिन संकोच हुआ साथी वहाँ अपना दुख कहतेजहाँ जीवन का चयन ही दुःख था और वे हँसते-गाते उन्हें गले लगाते चले जा रहे थेजहाँ सुख के कितने दरवाज़े अपने ही हाथों से बंद किये गए थेजहाँ इस साल जानदारी में कितने उत्सव, ब्याह पड़ेंगे का हिसाब नहींकितने अन्याय हुएकितने बेघर हुएऔर कितने निर्दोष जेल गये के दंश को आत्मा में सहेजा जा रहा था फिर भी वियोग की मारी मेरी आत्मा कुछ न कुछ उनसे कह ही लेती पर वे मेरे अपने बंजर नहीं थे किमैं दुःख के बीज फेंकती वहाँ और कोई डाभ न उपजती पर कहाँ उगाते वो मेरे इस गुलाबी दुःख कोजहाँ की धरती पर शहतूती सपने बोये जाते हैंऔर फ़सल काटने का इंतज़ार वहाँ नहीं होता बस पीढ़ियों के हवाले दुःखों की सूची करके अपनी राह चलते जाना होता है ।
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Us Din | Rupam Mishra
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