EPISODE · Jun 20, 2026 · 2 MIN
Ve Kaise Din The | Kirti Chowdhary
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
वे कैसे दिन थे। कीर्ति चौधरीवे कैसे दिन थेजब चीज़ें भागती थींऔर हम स्थिर थेजैसे ट्रेन के एक डिब्बे में बंद झाँकते हुएओझल होते थे दृश्यपल के पल में—...कौन थी यह तार पर बैठी हुईबुलबुल, गौरय्या या नीलकंठ?आसमान को छूता हुआसवन का जोड़ा था?दूरी पर झिलमिल-झिलमिल करतीनदिया थी?या रेती का भ्रम?कभी कम कभी ज़्यादाप्रश्न ही प्रश्न उठते थेहम विमूढ़ ठगे-सेसुलझाते ही रहतेऔर चीज़ें हो जाती थीं ओझलवे कैसे दिन थेजो रहे नहीं।सीख ली हमने चाल समय कीभागने लगे सरपटबदल गए सारे दृश्यशाखों पर दुबकी भूरी चिड़ियों नेकुतूहल से देखा हमेंहवा ने बढ़ाई बाँहरसभीनी गंधमयीलेकिन हम रुके नहींहमने सुनी ही नहींझरनों की कलकलताड़ पत्रों की बाँसुरीपोखर में खिले रहे दल के दल कमलऔर मुरझाए-से हमआगे और आगेभागते ही रहेछोड़ते चले ही गएजो कुछ पा सकते थेहाथ रही केवलयही अंतहीन दौड़और छूटते दिनों के संगपीछे सब छूट गया।
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