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Title
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भजन संहिता 28:6-9 | हे यहोवा अपनी प्रजा का उद्धार कर

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भजन संहिता 28:1-5 | हे यहोवा, मैं तुझी को पुकारूंगा

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भजन संहिता 27:11-14 | हे यहोवा, अपने मार्ग में मेरी अगुवाई कर

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भजन संहिता 27:7-10 | हे मेरे उद्धार करने वाले परमेश्वर मुझे त्याग न दे

5

भजन संहिता 27:4-6 | मैं यहोवा के तम्बू में जयजयकार के साथ बलिदान चढ़ाऊंगा

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भजन संहिता 27:1-3 | परमेश्वर मेरा ज्योति और मेरा उद्धार है

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भजन संहिता 26:8-12 | सभाओं में मैं यहोवा को धन्य कहा करूंगा

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भजन संहिता 26:1-8 | हे यहोवा, मुझ को जांच और परख

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भजन संहिता 25:12-22 | हे यहोवा मेरी ओर फिरकर मुझ पर अनुग्रह कर

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भजन संहिता 25:6-11 | हे यहोवा अपनी करूणा के कामों को स्मरण कर

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भजन संहिता 25:1-5 | हे यहोवा अपने मार्ग मुझ को दिखला

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भजन संहिता 24:7-10 | वह प्रतापी राजा कौन है?

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भजन संहिता 24:3-6 | यहोवा के पर्वत पर कौन चढ़ सकता है?

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भजन संहिता 24:1-2 | पृथ्वी और जो कुछ उस में है यहोवा ही का है

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भजन संहिता 23:5-6 | तू मेरे सताने वालों के साम्हने मेरे लिये मेज बिछाता है

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भजन संहिता 23:2-4 | वह मुझे हरी-हरी चराइयों में बैठाता है

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भजन संहिता 23:1 | यहोवा मेरा चरवाहा है

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भजन संहिता 22:22-31 | जो यहोवा के खोजी हैं, वे उसकी स्तुति करेंगे

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भजन संहिता 22:11-21 | हे यहोवा, मेरे प्राण को तलवार से बचा

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भजन संहिता 22:6-10 | माता के गर्भ ही से तू मेरा ईश्वर है

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भजन संहिता 22:1-5 | हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?

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भजन संहिता 21:7-13 | तेरा हाथ तेरे सब शत्रुओं को ढूंढ़ निकालेगा

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भजन संहिता 21:1-6 | हे यहोवा तेरी सामर्थ्य से राजा आनन्दित होगा

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भजन संहिता 20:5-9 | यहोवा अपने अभिषिक्त का उद्धार करता है

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भजन संहिता 20:1-4 | संकट के दिन यहोवा तेरी सुन ले

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भजन संहिता 19:12-14 | अपने दास को ढिठाई के पापों से भी बचाए रख

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भजन संहिता 19:7-11 | यहोवा के नियम विश्वासयोग्य हैं

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भजन संहिता 19:1-6 | आकशमण्डल ईश्वर की महिमा वर्णन कर रहा है

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भजन संहिता 18:46-50 | धन्य है मेरा पलटा लेने वाला ईश्वर

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भजन संहिता 18:29-45 | यहोवा को छोड़ क्या कोई ईश्वर है?

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भजन संहिता 18:20-28 | मेरा परमेश्वर मेरे अन्धियारे को उजियाला कर देता है

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भजन संहिता 18:4-19 | संकट में मैंने यहोवा परमेश्वर को पुकारा

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भजन संहिता 18:1-3 | यहोवा मेरी चट्टान, और मेरा छुड़ाने वाला है

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रोमियो 8:28 | जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें भलाई उत्पन्न करती है

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भजन संहिता 107:1 | यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है

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फिलिप्पियों 2:12 | डरते और कांपते हुए अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ

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यूहन्ना 17:3 | अनन्त जीवन यह है, कि वे सच्चे परमेश्वर को जाने

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मत्ती 1:21 | वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना

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1 कुरिन्थियों 15:10 | परमेश्वर का अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ

40

लूका 19:1-10 | मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उन का उद्धार करने आया है

41

लूका 5:27-32 | वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है

42

लूका 2:10-11 | मत डरो, मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूं

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भजन संहिता 17:13-15 | हे यहोवा, अपनी तलवार के बल से मेरे प्राण को बचा ले

44

भजन संहिता 17:6-12 | हे ईश्वर, मुझे अपने आंखो की पुतली की नाईं सुरक्षित रख

45

भजन संहिता 17:1-5 | हे यहोवा परमेश्वर, मेरी पुकार की ओर ध्यान दे

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भजन संहिता 16:8-11 | मैं ने यहोवा को निरन्तर अपने सम्मुख रखा है

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भजन संहिता 16:5-7 | यहोवा मेरा भाग और मेरे कटोरे का हिस्सा है

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भजन संहिता 16:2-4 | हे परमेश्वर, तू ही मेरा प्रभु है

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भजन संहिता 16:1 | हे ईश्वर मेरी रक्षा कर

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भजन संहिता 15:1-5 | हे परमेश्वर तेरे तम्बू में कौन रहेगा?

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भजन संहिता 14:4-7 | परमेश्वर धर्मी लोगों के बीच में निरन्तर रहता है

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भजन संहिता 14:1-3 | परमेश्वर ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की है

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भजन संहिता 13:1-6 | हे मेरे परमेश्वर यहोवा मेरी ओर ध्यान दे

54

भजन संहिता 12:5-8 | परमेश्वर का वचन पवित्र है

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भजन संहिता 12:1-4 | प्रभु सब चापलूस ओठों को काट डालेगा

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भजन संहिता 11:4-7 | परमेश्वर का सिंहासन स्वर्ग में है

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भजन संहिता 11:1-3 | मेरा भरोसा परमेश्वर पर है

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भजन संहिता 10:12-18 | यहोवा अनन्तकाल के लिये महाराज है

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भजन संहिता 10:1-12 | दुष्ट अपनी अभिलाषा पर घमण्ड करता है

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भजन संहिता 9:19-20 | हे परमेश्वर, उन को भय दिला

61

भजन संहिता 9:15-18 | यहोवा ने अपने को प्रगट किया, उसने न्याय किया है

62

भजन संहिता 9:13-15 | हे यहोवा, मुझ पर अनुग्रह कर

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भजन संहिता 9:9-12 | हे यहोवा तू ने अपने खोजियों को त्याग नहीं दिया

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भजन संहिता 9:3-8 | यहोवा सदैव सिंहासन पर विराजमान है

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भजन संहिता 9:1-2 | हे यहोवा, मैं अपने पूर्ण मन से तेरा धन्यवाद करूंगा

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भजन संहिता 8:9 | हे यहोवा, तेरा नाम पृथ्वी पर क्या ही प्रतापमय है

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भजन संहिता 8:3-8 | आदमी क्या है कि तू उसकी सुधि ले?

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भजन संहिता 8:1-2 | हे यहोवा तेरा नाम पृथ्वी पर क्या ही प्रतापमय है

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भजन संहिता 7:14-17 | दुष्ट ने जो खाई बनाई थी उस में वह आप ही गिरा

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भजन संहिता 7:11-13 | परमेश्वर धर्मी और न्यायी है

71

भजन संहिता 7:6-10 | यहोवा मेरे धर्म और खराई के अनुसार मेरा न्याय चुका दे

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भजन संहिता 7:1-5 | हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मेरा भरोसा तुझ पर है

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भजन संहिता 6:8-10 | मेरे सब शत्रु लज्जित होंगे और बहुत घबराएंगे

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भजन संहिता 6:1-7 | हे यहोवा, मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मैं कुम्हला गया हूं

75

भजन संहिता 5:8-12 | जितने यहोवा पर भरोसा रखते हैं वे सब आनन्द करें

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भजन संहिता 5:4-7 | यहोवा तो हत्यारे और छली मनुष्य से घृणा करता है

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भजन संहिता 5:1-3 | हे मेरे परमेश्वर, मेरी दोहाई पर ध्यान दे

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भजन संहिता 4:6-8 | हे यहोवा तू अपने मुख का प्रकाश हम पर चमका

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भजन संहिता 4:1-5 | हे मेरे धर्ममय परमेश्वर, जब मैं पुकारूं तब तू मुझे उत्तर दे

80

भजन संहिता 3:7-8 | हे यहोवा तेरी आशीष तेरी प्रजा पर हो

81

भजन संहिता 3:4-6 | मैं ऊंचे शब्द से यहोवा को पुकारता हूं

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भजन संहिता 3:1-3 | हे यहोवा, तू तो मेरे चारों ओर मेरी ढ़ाल है

83

भजन संहिता 2:10-12 | डरते हुए यहोवा की उपासना करो

84

भजन संहिता 2:7-9 | "मैं जाति जाति के लोगों को तेरी सम्पत्ति होने के लिये दे दूंगा"

85

भजन संहिता 2:4-6 | प्रभु उन को ठट्ठों में उड़ाएगा

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भजन संहिता 2:1-3 | जाति जाति के लोग क्यों हुल्लड़ मचाते हैं?

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भजन संहिता 1:4-6 | दुष्ट लोग भूसी के समान होते हैं, जो पवन से उड़ाई जाती है

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भजन संहिता 1:3 | वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है

89

भजन संहिता 1:1-2 | क्या ही धन्य है वह पुरूष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता

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नीतिवचन 31:30-31 | जो स्त्री यहोवा का भय मानती है, उसकी प्रशंसा की जाएगी

91

नीतिवचन 31:28-29 | उसके पुत्र उठ उठकर उस को धन्य कहते हैं

92

नीतिवचन 31:26-27 | वह अपने घराने के चाल चलन को ध्यान से देखती है

93

नीतिवचन 31:24-25 | वह बल और प्रताप का पहिरावा पहिने रहती है

94

नीतिवचन 31:23 | जब उसका पति सभा में पुरनियों के संग बैठता है, तब उसका सम्मान होता है

95

नीतिवचन 31:21-22 | वह अपने घराने के लिये हिम से नहीं डरती

96

नीतिवचन 31:20 | वह दीन और दरिद्र के संभालने को हाथ बढ़ाती है

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नीतिवचन 31:19 | वह अटेरन में हाथ लगाती है, और चरखा पकड़ती है

98

नीतिवचन 31:18 | वह परख लेती है कि मेरा व्यापार लाभदायक है

99

नीतिवचन 31:16-17 | वह किसी खेत के विषय में सोच विचार करती है और उसे मोल ले लेती है

100

नीतिवचन 31:15 | वह रात ही को उठ बैठती है, और अपने घराने को भोजन खिलाती है

101

नीतिवचन 31:13-14 | वह ऊन और सन ढूंढ़ ढूंढ़ कर, प्रसन्नता के साथ काम करती है

102

नीतिवचन 31:10-12 | भली पत्नी के पति के मन में उस के प्रति विश्वास है

103

नीतिवचन 31:10 | भली पत्नी कौन पा सकता है?

104

नीतिवचन 31:8-9 | गूंगे के लिये अपना मुंह खोल

105

नीतिवचन 31:4-7 | राजाओं का दाखमधु पीना उन को शोभा नहीं देता

106

नीतिवचन 31:3 | अपना बल स्त्रियों को न देना, न अपना जीवन उनके वश कर देना

107

नीतिवचन 31:1-2 | लमूएल राजा के वचन, जो उसकी माता ने उसे सिखाए

108

नीतिवचन 30:33 | जैसे दूध के मथने से मक्खन निकलता है, वैसे ही क्रोध से झगड़ा होता है

109

नीतिवचन 30:32 | यदि तू ने अपनी बड़ाई करने की मूढ़ता की, तो अपने मुंह पर हाथ धर

110

नीतिवचन 30:29-31 | चार प्राणी हैं, जिन की चाल सुन्दर है

111

नीतिवचन 30:28 | मकड़ी हाथ से पकड़ी तो जाती है, तौभी राजभवनों में रहती है

112

नीतिवचन 30:27 | टिड्डियों का राजा तो नहीं होता, तौभी वे सब दल बान्ध कर पलायन करती हैं

113

नीतिवचन 30:26 | शापान बली जाति नहीं, तौभी उनकी मान्दें पहाड़ों पर होती हैं

114

नीतिवचन 30:24-25 | पृथ्वी पर चार छोटे जन्तु हैं, जो अत्यन्त बुद्धिमान हैं

115

नीतिवचन 30:21-23 | तीन बातों के कारण पृथ्वी कांपती है

116

नीतिवचन 30:18-20 | तीन बातें वरन चार हैं, जो मेरी समझ से परे हैं

117

नीतिवचन 30:17 | जिस आंख से कोई अपने पिता पर अनादर की दृष्टि करे, उस को कौवे खोद-खोद कर निकालेंगे

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नीतिवचन 30:15-16 | जैसे जोंक की दो बेटियां होती हैं, जो कहती हैं दे, दे

119

नीतिवचन 30:11-14 | एक पीढ़ी के लोग ऐसे हैं– उनकी दृष्‍टि क्या ही घमण्ड से भरी रहती है

120

नीतिवचन 30:10 | किसी दास की, उसके स्वामी से चुगली न करना

121

नीतिवचन 30:7-9 | "प्रतिदिन की रोटी मुझे खिलाया कर"

122

नीतिवचन 30:5-6 | ईश्वर का एक एक वचन ताया हुआ है

123

नीतिवचन 30:4 | किस ने पृथ्वी के सिवानों को ठहराया है? उसका नाम क्या है?

124

नीतिवचन 30:1-3 | याके के पुत्र आगूर के प्रभावशाली वचन

125

नीतिवचन 29:25-26 | जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह ऊंचे स्थान पर चढ़ाया जाता है

126

नीतिवचन 29:24 | जो चोर की संगति करता है वह अपने प्राण का बैरी होता है

127

नीतिवचन 29:22-23 | मनुष्य को गर्व के कारण नीचा देखना पड़ता है

128

नीतिवचन 29:21 | जो अपने दास को लड़कपन से पालता है, वह उसका बेटा बन बैठता है

129

नीतिवचन 29:20 | उतावली करने वाले मनुष्य से अधिक तो मूर्ख ही से आशा है

130

नीतिवचन 29:19 | दास बातों ही के द्वारा सुधारा नहीं जाता

131

नीतिवचन 29:18 | जहां दर्शन की बात नहीं होती, वहां लोग निरंकुश हो जाते हैं

132

नीतिवचन 29:15-17 | जो लड़का यों ही छोड़ा जाता है वह अपनी माता की लज्जा का कारण होता है

133

नीतिवचन 29:14 | जो राजा कंगालों का न्याय चुकाता है, उसकी गद्दी स्थिर रहती है

134

नीतिवचन 29:13 | यहोवा निर्धन और अन्धेर करने वाले पुरूष की आंखों में ज्योति देता है

135

नीतिवचन 29:12 | जब हाकिम झूठ की ओर कान लगाता है, तब उसके सेवक दुष्ट हो जाते हैं

136

नीतिवचन 29:11 | मूर्ख अपने सारे मन की बात खोल देता है

137

नीतिवचन 29:10 | हत्यारे लोग खरे पुरूष से बैर रखते हैं

138

नीतिवचन 29:9 | जब बुद्धिमान मूढ़ के साथ वाद विवाद करता है, तब वहां शान्ति नहीं रहती

139

नीतिवचन 29:8 | ठट्ठा करने वाले लोग नगर को फूंक देते हैं

140

नीतिवचन 29:7 | धर्मी पुरूष कंगालों के मुकद्दमे में मन लगाता है

141

नीतिवचन 29:6 | बुरे मनुष्य का अपराध फन्दा होता है

142

नीतिवचन 29:4 | राजा न्याय से देश को स्थिर करता है

143

नीतिवचन 29:3 | वेश्याओं की संगति करनेवाला धन को उड़ा देता है

144

नीतिवचन 29:2 | जब दुष्‍ट प्रभुता करता है तब प्रजा हाय–हाय करती है

145

नीतिवचन 29:1 | जो बार-बार डाँटे जाने पर भी हठ करता है, वह अचानक नष्‍ट हो जाएगा

146

नीतिवचन 28:28 | जब दुष्ट लोग नाश हो जाते हैं, तब धर्मी उन्नति करते हैं

147

नीतिवचन 28:27 | जो निर्धन को दान देता है उसे घटी नहीं होती

148

नीतिवचन 28:26 | जो अपने ऊपर भरोसा रखता है, वह मूर्ख है

149

नीतिवचन 28:25 | जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह हृष्ट पुष्ट हो जाता है

150

नीतिवचन 28:24 | जो अपने मां-बाप को लूटता है, वह नाश करने वाले का संगी ठहरता है

151

नीतिवचन 28:23 | जो किसी मनुष्य को डांटता है, वह अन्त में अधिक प्यारा हो जाता है

152

नीतिवचन 28:21 | यह अच्छा नहीं कि पुरूष एक टुकड़े रोटी के लिये अपराध करे

153

नीतिवचन 28:20 | सच्चे मनुष्य पर बहुत आशीर्वाद होते रहते हैं

154

नीतिवचन 28:19 | जो निकम्मे लोगों की संगति करता है वह कंगालपन से घिरा रहता है

155

नीतिवचन 28:18 | जो किसी की हत्या का अपराधी हो, वह गड़हे में गिरेगा

156

नीतिवचन 28:17 | जो किसी की हत्या का अपराधी हो, वह गड़हे में गिरेगा

157

नीतिवचन 28:16 | जो प्रधान मन्दबुद्धि का होता है, वही बहुत अन्धेर करता है

158

नीतिवचन 28:15 | कंगाल प्रजा पर प्रभुता करने वाला दुष्ट, घूमने वाले रीछ के समान है

159

नीतिवचन 28:14 | जो मनुष्य निरन्तर प्रभु का भय मानता रहता है वह धन्य है

160

नीतिवचन 28:13 | जो अपने अपराध छिपा रखता है, उसका कार्य सफल नहीं होता

161

नीतिवचन 28:12 | जब दुष्ट लोग प्रबल होते हैं, तब मनुष्य अपने आप को छिपाता है

162

नीतिवचन 28:11 | धनी पुरूष अपनी दृष्टि में बुद्धिमान होता है, परन्तु...

163

नीतिवचन 28:10 | जो सीधे लोगों को कुमार्ग में ले जाता है, वह गड़हे में आप ही गिरता है

164

नीतिवचन 28:9 | जो व्यवस्था सुनने से कान फेर लेता है, उसकी प्रार्थना घृणित ठहरती है

165

नीतिवचन 28:8 | जो अपना धन बढ़ती से बढ़ाता है, वह कंगालों के लिये बटोरता है

166

नीतिवचन 28:7 | जो व्यवस्था का पालन करता वह समझदार सुपूत होता है

167

नीतिवचन 28:6 | खराई से चलने वाला निर्धन पुरूष उत्तम है

168

नीतिवचन 28:5 | बुरे लोग न्याय को नहीं समझ सकते

169

नीतिवचन 28:4 | जो लोग व्यवस्था को छोड़ देते हैं, वे दुष्ट की प्रशंसा करते हैं

170

नीतिवचन 28:3 | जो निर्धन पुरूष कंगालों पर अन्धेर करता है, वह भारी वर्षा के समान है

171

नीतिवचन 28:2 | देश में पाप होने के कारण उसके हाकिम बदलते जाते हैं

172

नीतिवचन 28:1 | दुष्‍ट लोग जब कोई पीछा नहीं करता तब भी भागते हैं

173

नीतिवचन 27:23-27 | अपने सब पशुओं की देखभाल उचित रीति से कर

174

नीतिवचन 27:21-22 | जैसे सोने के लिये भट्ठी हैं, वैसे ही मनुष्य के लिये उसकी प्रशंसा है

175

नीतिवचन 27:20 | मनुष्य की आंखें तृप्त नहीं होती

176

नीतिवचन 27:19 | जैसे जल में परछाई मिलती है, वैसे ही मनुष्य का मन दूसरे से मिलता है

177

नीतिवचन 27:18 | जो अपने स्वामी की सेवा करता उसकी महिमा होती है

178

नीतिवचन 27:17 | मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार होता है

179

नीतिवचन 27:14 | जो अपने पड़ोसी आशीर्वाद देता है, उसके लिये यह शाप गिना जाता है

180

नीतिवचन 27:12-13 | बुद्धिमान मनुष्य विपत्ति को आती देख कर छिप जाता है

181

नीतिवचन 27:11 | हे मेरे पुत्र, बुद्धिमान हो कर मेरा मन आनन्दित कर

182

नीतिवचन 27:9-10 | प्रेम करने वाला पड़ोसी, दूर रहने वाले भाई से कहीं उत्तम है

183

नीतिवचन 27:8 | घूमने वाला मनुष्य उस चिडिय़ा के समान है, जो घोंसला छोड़ कर उड़ती है

184

नीतिवचन 27:7 | भूखे को सब कड़वी वस्तुएं मीठी जान पड़ती हैं

185

नीतिवचन 27:6 | बैरी अधिक चुम्बन करता है

186

नीतिवचन 27:5-6 | जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वासयोग्य है

187

नीतिवचन 27:3-4 | बालू में बोझ है, परन्तु मूढ का क्रोध उस से भी भारी है

188

नीतिवचन 27:1-2 | तेरी प्रशंसा और लोग करें तो करें, परन्तु तू अपने आप न करना

189

नीतिवचन 26:28 | चिकनी चुपड़ी बात बोलने वाला, विनाश का कारण होता है

190

नीतिवचन 26:27 | जो गड़हा खोदे, वही उसी में गिरेगा

191

नीतिवचन 26:24-26 | भोलेपन का दिखावा - छल के मीठे वाक्यों से सावधान

192

नीतिवचन 26:20-23 | जैसा आग में लकड़ी, वैसा ही झगड़ा बढ़ाने के लिये झगडालू होता है

193

प्रकाशितवाक्य 20:6 | धन्य और पवित्र वह है, जो इस पहिले पुनरुत्थान का भागी है

194

रोमियो 6:4 | हम भी नए जीवन की सी चाल चलें

195

1 कुरिन्थियों 15:55-57 | हे मृत्यु तेरी जय कहां रही?

196

1 कुरिन्थियों 5:7 | हमारे फसह - मसीह के लहू का महत्व

197

1 पतरस 1:18-19 | तुम्हारा छुटकारा मसीह के लोहू से हुआ है

198

यूहन्ना 3:16 | EASTER का असली उद्देश्य क्या है?

199

नीतिवचन 26:18-19 | एक पागल जो तीर फेंकता है, वैसा ही होता है जो अपने पड़ोसी को धोखा दे

200

नीतिवचन 26:17 | पराये झगड़ों में हस्तक्षेप करना, कुत्ते के कान पकड़ने जैसा है

201

नीतिवचन 26:13-16 | आलसी कहता है, कि मार्ग और चौक में सिंह है!

202

नीतिवचन 26:11-12 | जैसे कुत्ता छाँट को चाटता है, वैसे ही मूर्ख मूर्खता को दुहराता है

203

नीतिवचन 26:7-9 | जैसे लंगड़ा लड़खड़ाता हैं वैसे ही मूर्खों के मुंह में नीतिवचन होता है

204

नीतिवचन 26:6-7 | जो मूर्ख के हाथ संदेशा भेजता है, वह अपने पांव में कुल्हाड़ा मारता है

205

नीतिवचन 26:4-5 | मूर्ख को उस की मूर्खता के अनुसार उत्तर न देना

206

नीतिवचन 26:3 | घोड़े के लिये कोड़ा और मूर्खों की पीठ के लिये छड़ी है

207

नीतिवचन 26:2 | जैसे गौरिया घूमते-घूमते नहीं बैठती, वैसे ही व्यर्थ शाप नहीं पड़ता

208

नीतिवचन 26:1 | जैसे कटनी के समय वर्षा ठीक नहीं, वैसे ही मूर्ख की महिमा ठीक नहीं होती

209

नीतिवचन 25:27-28 | कठिन बातों की पूछताछ महिमा का कारण होता है

210

नीतिवचन 25:26 | जो धर्मी दुष्ट के कहने में आता है, वह गंदले सोते के समान है

211

नीतिवचन 25:23-25 | चुगली करने से मुख पर क्रोध छा जाता है

212

नीतिवचन 25:21 | यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उस को रोटी खिलाना

213

नीतिवचन 25:20 | जैसा जाड़े के दिनों में किसी का वस्त्र उतारना होता है...

214

नीतिवचन 25:19 | विपत्ति के समय विश्वासघाती का भरोसा टूटे हुए दांत के समान है

215

नीतिवचन 25:17 | अपने पड़ोसी के घर में बारम्बार जाने से अपने पांव को रोक

216

नीतिवचन 25:16 | क्या तू ने मधु पाया? तो जितना तेरे लिये ठीक हो उतना ही खाना

217

नीतिवचन 25:14 | जैसे बादल बिना दृष्टि निर्लाभ होते हैं, वैसे ही झूठ दान देने वाले होते है

218

नीतिवचन 25:13 | विश्वासयोग्य दूत से भेजने वालों का जी ठण्डा होता है

219

नीतिवचन 25:11-12 | ठीक समय पर कहा हुआ वचन, सोने के सेब जैसा होता है

220

नीतिवचन 25:8-9 | झगड़ा करने में जल्दी न करना

221

नीतिवचन 25:6-7 | राजा के साम्हने अपनी बड़ाई न करना

222

नीतिवचन 25:5 | राजा के साम्हने से दुष्ट को निकाल देने पर उसकी गद्दी स्थिर होगी

223

नीतिवचन 25:4 | चान्दी में से मैल दूर करने पर...एक पात्र हो जाता है

224

नीतिवचन 25:2-3 | परमेश्वर की महिमा गुप्त रखने में है

225

नीतिवचन 25:1 | सुलैमान के नीतिवचन ये भी हैं

226

नीतिवचन 24:30-32 | आलसी के खेत में कटीले पेड़ भर गए हैं

227

नीतिवचन 24:28-29 | व्यर्थ अपने पड़ोसी के विरूद्ध साक्षी न देना

228

नीतिवचन 24:27 | अपना बाहर का काम काज ठीक करना...

229

नीतिवचन 24:26 | जो सीधा उत्तर देता है, वह होठों को चूमता है

230

नीतिवचन 24:24-25 | जो लोग दुष्ट को डांटते हैं उनका भला होता है

231

नीतिवचन 24:21-22 | हे मेरे पुत्र, यहोवा और राजा दोनों का भय मानना

232

नीतिवचन 24:19-20 | बुरे मनुष्य को अन्त में कुछ फल न मिलेगा

233

नीतिवचन 24:15-18 | जब तेरा शत्रु गिर जाए तब तू आनन्दित न हो

234

नीतिवचन 24:13-14 | हे मेरे पुत्र तू मधु खा, क्योंकि वह अच्छा है

235

नीतिवचन 24:11-12 | जो मार डाले जाने के लिये घसीटे जाते हैं उन को छुड़ा

236

नीतिवचन 24:10 | यदि तू विपत्ति के समय साहस छोड़ दे...

237

नीतिवचन 24:7-9 | मूर्खता का विचार भी पाप है

238

नीतिवचन 24:5-6 | जब तू युद्ध करे, तब युक्ति के साथ करना

239

नीतिवचन 24:3-4 | घर बुद्धि से बनता है

240

नीतिवचन 24:1-2 | बुरे लोगों के विषय में डाह न करना

241

नीतिवचन 23:29-35 | जब दाखमधु लाल दिखाई देता है... तब उस को न देखना

242

नीतिवचन 23:26-28 | पराई स्त्री सकेत कुंए के समान है

243

नीतिवचन 23:22-25 | जब तेरी माता बुढिय़ा हो जाए, तब भी उसे तुच्छ न जानना

244

नीतिवचन 23:19-21 | दाखमधु के पीने वालों में न होना

245

नीतिवचन 23:15-18 | तू दिन भर यहोवा का भय मानते रहना

246

नीतिवचन 23v13-14 | लड़के की ताड़ना न छोड़ना...वह न मरेगा

247

नीतिवचन 23:12 | अपने कान ज्ञान की बातों की ओर लगाना

248

नीतिवचन 23:10-11 | पुराने सिवानों को न बढ़ाना, और न अनाथों के खेत में घुसना

249

नीतिवचन 23:9 | मूर्ख के साम्हने न बोलना, नहीं तो...

250

नीतिवचन 23:6-8 | धनी होने के लिये परिश्रम न करना

251

नीतिवचन 23:4-5 | धनी होने के लिये परिश्रम न करना

252

नीतिवचन 23:1-3 | इस बात को मन लगा कर सोचना कि मेरे साम्हने कौन है

253

नीतिवचन 22:29 | ऐसा पुरूष जो कामकाज में निपुण हो, वह राजाओं के सम्मुख खड़ा होगा

254

नीतिवचन 22:28 | जो सिवाना तेरे पुरखाओं ने बान्धा हो, उस को न बढ़ाना

255

नीतिवचन 22:26-27 | जो लोग ऋणियों के उत्तरदायी होते हैं, उन में तू न होना

256

नीतिवचन 22:24-25 | क्रोधी मनुष्य का मित्र न होना और उसके संग न चलना

257

नीतिवचन 22:17-19 | मैं इसलिये ये बातें तुझ को जता देता हूं, कि तेरा भरोसा यहोवा पर हो

258

नीतिवचन 22:16 | जो लाभ के निमित्त कंगाल पर अन्धेर करता है वे केवल हानि ही उठाते हैं

259

नीतिवचन 22:12 | यहोवा ज्ञानी पर दृष्टि कर के, उसकी रक्षा करता है

260

नीतिवचन 22:11 | जो मन की शुद्धता से प्रीति रखता है... राजा उसका मित्र होता है

261

नीतिवचन 22:10 | ठट्ठा करने वाले को निकाल दे, तब झगड़ा मिट जाएगा

262

नीतिवचन 22:7-9 | जो कुटिलता का बीज बोता है, वह अनर्थ ही काटेगा

263

नीतिवचन 22:6 | लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिस में उस को चलना चाहिये

264

नीतिवचन 22:4-5 | टेढ़े मनुष्य के मार्ग में कांटे और फन्दे रहते हैं

265

नीतिवचन 22:1 | बड़े धन से अच्छा नाम अधिक चाहने योग्य है

266

नीतिवचन 21:30-31 | यहोवा के विरूद्ध न तो कुछ बुद्धि, न कोई युक्ति चलती है

267

नीतिवचन 21:29 | जो सीधा है, वह अपनी चाल सीधी करता है

268

नीतिवचन 21:27 | दुष्टों का बलिदान घृणित लगता है

269

नीतिवचन 21:23 | जो अपने मुंह को वश में रखता है वह प्राण को बचाता है

270

नीतिवचन 21:22 | बुद्धिमान शूरवीरों के नगर पर चढ़ कर... नाश करता है

271

नीतिवचन 21:20 | बुद्धिमान के घर में उत्तम धन और तेल पाए जाते हैं

272

यशायाह 40:31 | जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वे नया बल प्राप्त करते जाएंगे

273

प्रेरितों 2:42 | और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने...और प्रार्थना करने में लौलीन रहे

274

1 थिस्सलुनीकियों 5:17-18 | निरन्तर प्रार्थना मे लगे रहो... हर बात में धन्यवाद करो

275

भजन संहिता 16:1 | हे ईश्‍वर मेरी रक्षा कर, क्योंकि मैं तेरा ही शरणागत हूँ

276

हबक्कूक 2:1 | मैं अपने पहरे पर खड़ा रहूंगा, और गुम्मट पर चढ़ कर ठहरा रहूंगा

277

भजन संहिता 23:1 | यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी

278

यूहन्ना 3:16 | ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो

279

यूहन्ना 17:9 | मैं उन के लिये बिनती करता हूं... जिन्हें तू ने मुझे दिया है

280

यूहन्ना 14:16-17 | "मैं पिता से बिनती करूंगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा"

281

मत्ती 20:32-34 | "तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये करूं?"

282

लूका 2:29-32 | "मेरी आंखो ने तेरे उद्धार को देख लिया है"

283

लूका 1:38 | "मैं प्रभु की दासी हूं, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो"

284

न्यायियों 1:12-15 | "तू ने मुझे दक्खिन देश तो दिया है, जल के सोते भी दे"

285

भजन संहिता 2:8 | मैं दूर दूर के देशों को तेरी निज भूमि बनने के लिये दे दूंगा

286

इफिसियों 6:18 | सब पवित्र लोगों के लिये लगातार बिनती किया करो

287

याकूब 5:16 | धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है

288

भजन संहिता 121:1-2 | मैं अपनी आंखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा

289

यशायाह 55:6 | जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो

290

लूका 17:5 | “हमारा विश्‍वास बढ़ा”

291

भजन संहिता 62:5 | हे मेरे मन, परमेश्‍वर के सामने चुपचाप रह

292

भजन संहिता 95:6 | आओ हम झुक कर अपने कर्ता यहोवा के साम्हने घुटने टेकें

293

भजन संहिता 5:2 | हे मेरे परमेश्‍वर, मेरी दोहाई पर ध्यान दे

294

मत्ती 14:23 | प्रार्थना करने को अलग पहाड़ पर चढ़ गया

295

यशायाह 43:22 | तौभी हे याकूब, तू ने मुझ से प्रार्थना नहीं की

296

नीतिवचन 20:7 | जो खराई से चलता है उसके लड़के बाले धन्य होते हैं

297

नीतिवचन 19:17 | जो कंगाल पर अनुग्रह करता है, वह यहोवा को उधार देता है

298

नीतिवचन 18:20-21 | जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं

299

नीतिवचन 18:6-8 | मूर्ख का विनाश उस की बातों से होता है

300

नीतिवचन 17:27-28 | जो संभल कर बोलता है, वही ज्ञानी ठहरता है

301

नीतिवचन 17:3 | मनों को यहोवा जांचता है

302

नीतिवचन 16:11 | सच्चा तराजू और पलड़े यहोवा की ओर से होते हैं

303

नीतिवचन 16:4 | यहोवा ने सब वस्तुएं विशेष उद्देश्य के लिये बनाईं हैं

304

नीतिवचन 15:3 | यहोवा की आंखें सब स्थानों में लगी रहती हैं

305

नीतिवचन 14:27 | यहोवा का भय मानना, जीवन का सोता है

306

नीतिवचन 14:1 | हर बुद्धिमान स्त्री अपने घर को बनाती है

307

नीतिवचन 13:24 | जो बेटे पर छड़ी नहीं चलाता वह उसका बैरी है

308

नीतिवचन 13:13 | जो वचन को तुच्छ जानता, वह नाश हो जाता है!

309

नीतिवचन 12:22 | झूठों से यहोवा को घृणा आती है

310

नीतिवचन 11:28 | जो अपने धन पर भरोसा रखता है वह गिर जाता है

311

नीतिवचन 11:16 | अनुग्रह करने वाली स्त्री प्रतिष्ठा नहीं खोती है

312

नीतिवचन 10:29-30 | धर्मी सदा अटल रहेगा, परन्तु दुष्ट पृथ्वी पर बसने न पाएंगे

313

नीतिवचन 10:11 | धर्मी का मुंह तो जीवन का सोता है

314

नीतिवचन 9:10-12 | यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है

315

नीतिवचन 8:10-11 | चान्दी नहीं, मेरी शिक्षा ही को लो

316

नीतिवचन 6:6-11 | हे आलसी, चींटियों के काम पर ध्यान दे

317

नीतिवचन 4:18 | धर्मियों की चाल चमकती हुई ज्योति के समान है

318

नीतिवचन 3:35 | अपने सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना

319

नीतिवचन 3:5-6 | अपने सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना

320

नीतिवचन 3:1-2 | शांतिपूर्ण और सफल जीवन का रहस्य

321

नीतिवचन 2:3-6 | परमेश्वर के ज्ञान के उपहार को खोजे

322

⚠️ ज़रूरी सूचना ⚠️ | नीतिवचन 1:10 | बुरी संगति रखने का खतरा

323

नीतिवचन 21:18 | दुष्ट जन धर्मी की छुडौती ठहरता है

324

नीतिवचन 21:17 | जो दाखमधु पीने और तेल लगाने से प्रीति रखता है, वह धनी नहीं होता

325

नीतिवचन 21:16 | बुद्धि के मार्ग से भटक मनुष्य का ठिकाना मरे हुओं के बीच में होगा

326

नीतिवचन 21:14-15 | चुपके से दी हुई घूस से बड़ी जलजलाहट भी थमती है

327

नीतिवचन 21:13 | जो कंगाल की दोहाई पर कान न दे, उसकी सुनी न जाएगी

328

नीतिवचन 21:9 | झगड़ालू पत्नी के संग रहने से छत के कोने पर रहना उत्तम है

329

नीतिवचन 21:5 | उतावली करने वाले को केवल घटती होती है

330

नीतिवचन 21:3-4 | धर्म और न्याय करना, यहोवा को बलिदान से अधिक अच्छा लगता है

331

नीतिवचन 21:1-2 | राजा का मन नालियों के जल की नाईं यहोवा के हाथ में रहता है

332

नीतिवचन 20:30 | चोट लगने से जो घाव होते हैं, वह बुराई दूर करते हैं

333

नीतिवचन 20:29 | बूढ़ों की शोभा उनके पक्के बाल हैं

334

नीतिवचन 20:27 | मनुष्य की आत्मा यहोवा का दीपक है

335

नीतिवचन 20:26 | बुद्धिमान राजा दुष्टों को फटकता है

336

नीतिवचन 20:25 | जो मन्नत मान कर पूछ पाछ करने लगे, वह फन्दे में फंसेगा

337

नीतिवचन 20:22 | मत कह, कि मैं बुराई का पलटा लूंगा

338

नीतिवचन 20:20-21 | जो अपने माता-पिता को कोसता, उसका दिया बुझ जाता हैं

339

नीतिवचन 20:18 | सब कल्पनाएं सम्मति ही से स्थिर होती हैं

340

नीतिवचन 20:16 | जो पराए का उत्तरदायी हुआ उस से बंधक की वस्तु ले रख

341

नीतिवचन 20:15 | ज्ञान की बातें अनमोल मणी ठहरी हैं

342

नीतिवचन 20:14 | मोल लेने के समय ग्राहक तुच्छ तुच्छ कहता है

343

नीतिवचन 20:13 | नींद से प्रीति न रख, नहीं तो दरिद्र हो जाएगा

344

नीतिवचन 20:12 | कान और आंखें, दोनों को यहोवा ने बनाया है

345

नीतिवचन 20:11 | लड़का भी अपने कामों से पहिचाना जाता है

346

नीतिवचन 20:10 | घटते–बढ़ते बटखरे और नपुए से यहोवा घृणा करता है

347

नीतिवचन 20:9 | कौन कह सकता है कि मैं पाप से शुद्ध हुआ हूं?

348

नीतिवचन 20:8 | राजा अपनी दृष्टि ही से सब बुराई को उड़ा देता है

349

नीतिवचन 20:7 | जो खराई से चलता है उसके लड़के बाले धन्य होते हैं

350

नीतिवचन 20:6 | बहुत से मनुष्य अपनी कृपा का प्रचार करते हैं

351

नीतिवचन 20:5 | मनुष्य के मन की युक्ति अथाह है

352

नीतिवचन 20:3 | मुकद्दमे से हाथ उठाना, पुरूष की महिमा ठहरती है

353

नीतिवचन 20:1 | दाखमधु ठट्ठा करने वाला और मदिरा हल्ला मचाने वाली है

354

नीतिवचन 19:28-29 | अधर्मी साक्षी न्याय को ठट्ठों में उड़ाता है

355

नीतिवचन 19:27 | यदि तू भटकना चाहता है, तो शिक्षा का सुनना छोड़ दे

356

नीतिवचन 19:26 | जो पुत्र अपने माँ-बाप को उजाड़ता है...

357

नीतिवचन 19:24-25 | ठट्ठा करने वाले को मार, इस से भोला मनुष्य समझदार हो जाएगा

358

नीतिवचन 19:23 | यहोवा का भय मानने से जीवन बढ़ता है

359

नीतिवचन 19:21-22 | मनुष्य के मन में बहुत सी कल्पनाएं होती हैं

360

नीतिवचन 19:18-19 | जब तक आशा है तो अपने पुत्र को ताड़ना कर

361

नीतिवचन 19:17 | जो कंगाल पर अनुग्रह करता है, वह यहोवा को उधार देता है

362

नीतिवचन 19:13-14 | पत्नी के झगड़े-रगड़े सदा टपकने के समान है

363

नीतिवचन 19:11-12 | राजा की प्रसन्नता घास पर की ओस के तुल्य होती है

364

नीतिवचन 19:10 | हाकिमों पर दास का प्रभुता करना कैसे फबे

365

नीतिवचन 19:8 | जो समझ को धरे रहता है उसका कल्याण होता है

366

नीतिवचन 19:5 | झूठा साक्षी निर्दोष नहीं ठहरता

367

नीतिवचन 19:2-3 | मनुष्य का ज्ञान रहित रहना अच्छा नहीं

368

नीतिवचन 19:1 | जो निर्धन खराई से चलता है, वह उस मूर्ख से उत्तम है

369

नीतिवचन 18:24 | मित्रों के बढ़ाने से तो नाश होता है

370

नीतिवचन 18:23 | निर्धन गिड़गिड़ा कर बोलता है

371

नीतिवचन 18:22 | जिस ने स्त्री ब्याह ली, उस ने उत्तम पदार्थ पाया

372

नीतिवचन 18:20-21 | जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं

373

नीतिवचन 18:19 | चिढ़े हुए भाई को मनाना दृढ़ नगर के ले लेने से कठिन होता है

374

नीतिवचन 18:18 | चिट्ठी डालने से झगड़े बन्द होते हैं

375

नीतिवचन 18:17 | मुकद्दमे में जो पहिले बोलता, वही धर्मी जान पड़ता है

376

नीतिवचन 18:16 | भेंट मनुष्य के लिये मार्ग खोल देती है

377

नीतिवचन 18:14 | जब आत्मा हार जाती है तब इसे कौन सह सकता है?

378

नीतिवचन 18:13 | जो बिना बात सुने उत्तर देता है, वह मूढ़ ठहरता है

379

नीतिवचन 18:10-11 | यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है

380

नीतिवचन 18:9 | जो काम में आलस करता, वह बिगाड़ने वाले का भाई ठहरता है

381

नीतिवचन 18:6-8 | मूर्ख का विनाश उस की बातों से होता है

382

नीतिवचन 18:4 | मनुष्य के मुंह के वचन गहिरा जल के सोते हैं

383

नीतिवचन 18:1-2 | जो औरों से अलग होता है...वह अपनी ही इच्छा के लिये ऐसा करता है

384

जो संभल कर बोलता है, वही ज्ञानी ठहरता है | नीतिवचन 17:27-28

385

मूर्ख पुत्र से पिता उदास होता है | नीतिवचन 17:25

386

मूर्ख की आंखे पृथ्वी के दूर दूर देशों में लगी रहती है | नीतिवचन 17:24

387

मन का आनन्द अच्छी औषधि है | नीतिवचन 17:22

388

निर्बुद्धि मनुष्य हाथ पर हाथ मारता है | नीतिवचन 17:18

389

मित्र सब समयों में प्रेम रखता है | नीतिवचन 17:17

390

बुद्धि मोल लेने के लिये मूर्ख अपने हाथ में दाम क्यों लिए है? | नीतिवचन 17:16

391

जो दोषी को निर्दोष ठहराता है उन से यहोवा घृणा करता है | नीतिवचन 17:15

392

झगड़ा बढ़ने से पहिले उस को छोड़ देना उचित है | नीतिवचन 17:14

393

मूढ़ता में डूबे हुए मूर्ख से मिलना भला नहीं | नीतिवचन 17:12

394

एक घुड़की समझने वाले के मन में अधिक गड़ती है | नीतिवचन 17:10-11

395

जो दूसरे के अपराध को ढांप देता, वह प्रेम का खोजी ठहरता है | नीतिवचन 17:9

396

देने वाले के हाथ में घूस मोह लेने वाले मणि का काम देता है | नीतिवचन 17:8

397

प्रधान के मुख से झूठी बात नहीं फबती | नीतिवचन 17:7

398

बाल-बच्चों की शोभा उनके माता-पिता हैं | नीतिवचन 17:6

399

मनों को यहोवा जांचता है | नीतिवचन 17:3

400

बुद्धिमान दास अपने स्वामी के पुत्र पर शासन करेगा | नीतिवचन 17:2

401

चैन के साथ सूखा टुकड़ा उस घर की अपेक्षा उत्तम है जिस में झगड़े हों | नीतिवचन 17:1

402

चिट्ठी का निकलना यहोवा ही की ओर से होता है | नीतिवचन 16:33

403

विलम्ब से क्रोध करना वीरता से उत्तम है | नीतिवचन 16:32

404

पक्के बाल शोभायमान मुकुट ठहरते हैं | नीतिवचन 16:31

405

उपद्रवी मनुष्य अपने पड़ोसी को फुसला कर कुमार्ग पर चलाता है | नीतिवचन 16:29-30

406

टेढ़ा मनुष्य बहुत झगड़े को उठाता है | नीतिवचन 16:27-28

407

बुद्धिमान का मन उसके मुंह पर भी बुद्धिमानी प्रगट करता है | नीतिवचन 16:23-24

408

जिसके हृदय में बुद्धि है, वह समझ वाला कहलाता है | नीतिवचन 16:21-22

409

जो यहोवा पर भरोसा रखता, वह धन्य होता है | नीतिवचन 16:20

410

विनाश से पहिले गर्व, और ठोकर खाने से पहिले घमण्ड होता है | नीतिवचन 16:18-19

411

जो अपने चाल की चौकसी करता, वह अपने प्राण की रक्षा करता है | नीतिवचन 16:16-17

412

राजा का क्रोध मृत्यु के दूत के समान है | नीतिवचन 16:14-15

413

दुष्टता करना राजाओं के लिये घृणित काम है | नीतिवचन 16:12-13

414

सच्चा तराजू और पलड़े यहोवा की ओर से होते हैं | नीतिवचन 16:11

415

राजा के मुंह से दैवी वाणी निकलती है | नीतिवचन 16:10

416

जब किसी का चाल चलन यहोवा को भावता है... | नीतिवचन 16:7

417

यहोवा के भय मानने के द्वारा मनुष्य बुराई करने से बच जाते हैं | नीतिवचन 16:6

418

यहोवा ने सब वस्तुएं विशेष उद्देश्य के लिये बनाईं हैं | नीतिवचन 16:4

419

अपने कामों को यहोवा पर डाल दे | नीतिवचन 16:3

420

मनुष्य अपनी दृष्टि में पवित्र ठहरता है, परन्तु यहोवा मन को तौलता है | नीतिवचन 16:2

421

मुंह से कहना यहोवा की ओर से होता है | नीतिवचन 16:1

422

यहोवा के भय मानने से शिक्षा प्राप्त होती है | नीतिवचन 15:32-33

423

जो जीवनदायी डांट सुनता है, वह बुद्धिमानों के संग ठिकाना पाता है | नीतिवचन 15:31

424

अपने ही लोहू के द्वारा पवित्र स्थान में प्रवेश किया | इब्रानियों 9:12

425

आंखों की चमक से मन को आनन्द होता है | नीतिवचन 15:30

426

धर्मी मन में सोचता है कि क्या उत्तर दूं | नीतिवचन 15:28

427

जिस घड़ी तुम सोचते भी नहीं, उस घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जावेगा | लूका 12:36-40

428

लालची अपने घराने को दु:ख देता है | नीतिवचन 15:27

429

यहोवा विधवा के सिवाने को अटल रखता है | नीतिवचन 15:25

430

बुद्धिमान के लिये जीवन का मार्ग ऊपर की ओर जाता है | नीतिवचन 15:24

431

अवसर पर कहा हुआ वचन क्या ही भला होता है! | नीतिवचन 15:23

432

बिना सम्मति की कल्पनाएं निष्फल हुआ करती हैं | नीतिवचन 15:22

433

निर्बुद्धि को मूढ़ता से आनन्द होता है | नीतिवचन 15:21

434

बुद्धिमान पुत्र से पिता आनन्दित होता है | नीतिवचन 15:20

435

आलसी का मार्ग कांटों से रून्धा हुआ होता है | नीतिवचन 15:19

436

जो विलम्ब से क्रोध करने वाला है, वह मुकद्दमों को दबा देता है | नीतिवचन 15:18

437

प्रेम वाले घर में साग पात का भोजन उत्तम है | नीतिवचन 15:17

438

यहोवा के भय के साथ रखा हुआ थोड़ा ही धन उत्तम है | नीतिवचन 15:16

439

जिसका मन प्रसन्न रहता है, वह मानो नित्य भोज में जाता है | नीतिवचन 15:15

440

मन आनन्दित होने से मुख पर भी प्रसन्नता छा जाती है | नीतिवचन 15:13

441

ठट्ठा करने वाला डांटे जाने से प्रसन्न नहीं होता | नीतिवचन 15:12

442

अधोलोक और विनाशलोक यहोवा के साम्हने खुले रहते हैं | नीतिवचन 15:11

443

जो डांट से बैर रखता, वह अवश्य मर जाता है | नीतिवचन 15:10

444

दुष्ट लोगों के बलिदान से यहोवा धृणा करता है | नीतिवचन 15:8-9

445

धर्मी के घर में बहुत धन रहता है | नीतिवचन 15:6

446

उलट फेर की बात से आत्मा दु:खित होती है | नीतिवचन 15:4

447

यहोवा की आंखें सब स्थानों में लगी रहती हैं | नीतिवचन 15:3

448

कोमल उत्तर सुनने से जलजलाहट ठण्डी होती है | नीतिवचन 15:1-2

449

जिस ने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है... वही उसे पूरा करेगा | फिलिप्पियों 1:6

450

तुम भी अपने आप को परमेश्वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो | रोमियो 6:11

451

वैसे ही तुम मसीह यीशु हमारे प्रभु की संगति में चलते रहो | कुलुस्सियों 2:6-7

452

तुम परमेश्वर की भली, भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो | रोमियो 12:1-2

453

और वही देह, अर्थात कलीसिया का सिर है | कुलुस्सियों 1:18

454

"मेरा भोजन यह है, कि अपने भेजने वाले की इच्छा के अनुसार चलूं..." | यूहन्ना 4:34

455

यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि क्रूस की मृत्यु भी सह ली | फिलिप्पियों 2:8

456

निडरता और दृढ़ता के साथ परमेश्वर से प्रार्थना करे | लूका 11:5-8

457

जो परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं | रोमियो 8:14

458

तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो | मत्ती 6:10

459

क्योंकि मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है | 2 कुरिन्थियों 5:14-15

460

"जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा" | यूहन्ना 15:9-10

461

"आपस में प्रेम रखोगे तो सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो" | यूहन्ना 13:34-35

462

"जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दुसरे से प्रेम रखो" | यूहन्ना 13:34

463

सो सत्य से अपनी कमर कस लो | इफिसियों 6:13-14

464

और जितने लोग अधर्म से प्रसन्न होते हैं, सब दण्ड पाएं | 2 थिस्सलुनीकियों 2:7-12

465

हम उस में जो सत्य है, अर्थात उसके पुत्र यीशु मसीह में रहते हैं | 1 यूहन्ना 5:20

466

वह सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा | यूहन्ना 16:13

467

मेरा घर सब जातियों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा | मरकुस 11:17

468

उस पवित्रता के खोजी हो जिस के बिना कोई प्रभु को न देखेगा | इब्रानियों 12:14

469

"सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है..." | यशायाह 6:1-3

470

किसी का जीवन उस की संपत्ति की बहुतायत से नहीं होता | लूका 12:15

471

क्योंकि मैं उसे जिस की मैं ने प्रतीति की है, जानता हूं | 2 तीमुथियुस 1:12

472

क्योंकि हम मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए है | इफिसियों 2:10

473

आने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए | इफिसियों 2:6-7

474

तुम जो पहिले दूर थे, मसीह के लोहू के द्वारा निकट हो गए हो | इफिसियों 2:13

475

और स्वर्गीय स्थानों में मसीह यीशु के साथ बैठाया | इफिसियों 2:6

476

अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है | इफिसियों 2:5

477

तब यीशु ने फिर बड़े शब्द से चिल्‍लाकर प्राण छोड़ दिए (भाग-2) | मत्ती 27:50-53 | Easter Series

478

तब यीशु ने फिर बड़े शब्द से चिल्‍लाकर प्राण छोड़ दिए (भाग-1) | मत्ती 27:50-53 | Easter Series

479

"हे यहोवा, हे सत्यवादी ईश्‍वर, तू ने मुझे मोल लेकर मुक्‍त किया है" | भजन संहिता 31:5 | Easter Series

480

“हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ” (भाग-2) | लूका 23:46 | Easter Series

481

“हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ” (भाग-1) | लूका 23:46 | Easter Series

482

यीशु ने कहा "पूरा हुआ" और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिए (भाग-3) | यूहन्ना 19:30 | Easter Series

483

यीशु ने कहा "पूरा हुआ" और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिए (भाग-2) | यूहन्ना 19:30 | Easter Series

484

यीशु ने कहा "पूरा हुआ" और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिए (भाग-1) | यूहन्ना 19:30 | Easter Series

485

यीशु ने यह जानकर कि सब कुछ हो चुका... कहा "मैं प्यासा हूं" | यूहन्ना 19:28 | Easter Series

486

"एली, एली, लमा शबक्तनी ?" | मत्ती 27:46 | Easter Series

487

"...आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा" | लूका 23:42-43 | Easter Series

488

"हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहें हैं..." (भाग-2) | लूका 23:34 | Easter Series

489

"हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहें हैं..." | लूका 23:34 | Easter Series

490

परमेश्वर का मेम्ना... जो जगत के पाप उठा ले जाता है | यूहन्ना 1:29 | Easter Series

491

"...मेरे सिवा कोई तेरा उद्धारकर्ता नहीं हैं" | होशे 13:4 | Easter Series

492

मसीह का लोहू... तुम्हारे विवेक को... क्यों न शुद्ध करेगा ! | इब्रानियों 9:13-14 | Easter Series

493

इसलिये कि व्यवस्था ने किसी बात की सिद्धि नहीं कि | इब्रानियों 7:19 | Easter Series

494

विश्वास ही से उस ने फसह और लोहू छिड़कने की विधि मानी | इब्रानियों 11:28 | Easter Series

495

परमेश्वर ने प्रथम युग के भक्तिहीन संसार पर महा जल-प्रलय भेजा | 2 पतरस 2:5 | Easter Series

496

विश्वास ही से हाबिल ने उत्तम बलिदान परमेश्वर के लिये चढ़ाया | इब्रानियों 11:4 | Easter Series

497

बिना लहू बहाए पापों की क्षमा नहीं! | उत्पत्ति 3:21 | Easter Series

498

वह मेम्ना जो जगत की उत्पत्ति के समय घात हुआ | प्रकाशितवाक्य 13:8 | Easter Series

499

हमारे परमेश्वर यहोवा की मनोहरता हम पर प्रगट हो | भजन संहिता 90:17

500

यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा | भजन संहिता 121:7 | दैनिक मन्ना

501

हे प्रभु, तू पीढ़ी से पीढ़ी तक हमारे लिये धाम बना है! | भजन संहिता 90:1

502

यहोवा यों कहता है: "मैं सब से पहिला हूं और मैं ही अन्त तक रहूंगा !" | यशायाह 44:6

503

...वह नहीं जानता था कि उसके चेहरे से किरणें निकल रही हैं! | निर्गमन 34:29

504

चुप हो जाओ और जान लो, कि मैं ही परमेश्वर हूं! | भजन संहिता 46:10

505

जो कर्मचारी बुद्धि से काम करता है, उस पर राजा प्रसन्न होता है | नीतिवचन 14:35

506

जाति की बढ़ती धर्म ही से होती है | नीतिवचन 14:34

507

मूर्खों के अन्त:करण में जो कुछ है वह प्रगट हो जाता है | नीतिवचन 14:33

508

दुष्ट मनुष्य बुराई करता हुआ नाश हो जाता है | नीतिवचन 14:32

509

जो कंगाल पर अंधेर करता, वह उसके कर्ता की निन्दा करता है! | नीतिवचन 14:31

510

शान्त मन, तन का जीवन है | नीतिवचन 14:30

511

राजा की महिमा प्रजा की बहुतायत से होती है | नीतिवचन 14:28

512

यहोवा का भय मानना, जीवन का सोता है | नीतिवचन 14:27

513

यहोवा के भय मानने से दृढ़ भरोसा होता है | नीतिवचन 14:26

514

जो झूठी बातें उड़ाया करता है उस से धोखा ही होता है | नीतिवचन 14:25

515

बुद्धिमानों का धन उन का मुकुट ठहरता है | नीतिवचन 14:24

516

तुम लड़ाइयों की चर्चा सुनोगे... इन का होना अवश्य है! | मत्ती 24:6

517

तुम लड़ाइयों की चर्चा सुनोगे, देखो घबरा न जाना | मत्ती 24:6-7

518

बकवाद करने से केवल घटती होती है! | नीतिवचन 14:23

519

निर्धन का पड़ोसी भी उस से घृणा करता है! | नीतिवचन 14:20-21

520

दुष्ट लोग धर्मी के फाटक पर दण्डवत करते हैं | नीतिवचन 14:19

521

जो झट क्रोध करे, वह मूढ़ता का काम भी करेगा | नीतिवचन 14:17

522

बुद्धिमान डर कर बुराई से हटता है | नीतिवचन 14:16

523

भोला तो हर एक बात को सच मानता है | नीतिवचन 14:15

524

जिसका मन ईश्वर से हटता है वह अपनी चाल-चलन का फल भोगता है! | नीतिवचन 14:14

525

हंसी के समय भी मन उदास होता है! | नीतिवचन 14:13

526

ऐसा मार्ग है जो मनुष्य को ठीक दिखता है, परन्तु... | नीतिवचन 14:12

527

सीधे लोगों के तम्बू में आबादी होती है | नीतिवचन 14:11

528

मन अपना ही दु:ख जानता है! | नीतिवचन 14:10

529

मूढ़ लोग दोषी होने को ठट्ठा जानते हैं | नीतिवचन 14:9

530

मूर्खों की मूढ़ता छल करना है | नीतिवचन 14:8

531

मूर्ख से अलग हो जा! | नीतिवचन 14:7

532

ठट्ठा करने वाला बुद्धि को ढूंढ़ता, परन्तु नहीं पाता | नीतिवचन 14:6

533

झूठा साक्षी झूठी बातें उड़ाता है | नीतिवचन 14:5

534

जहां बैल नहीं, वहां गौशाला निर्मल तो रहती है! | नीतिवचन 14:4

535

मूढ़ के मुंह में गर्व का अंकुर है! | नीतिवचन 14:3

536

हर बुद्धिमान स्त्री अपने घर को बनाती है | नीतिवचन 14:1

537

धर्मी पेट भर खाने पाता है | नीतिवचन 13:25

538

जो बेटे पर छड़ी नहीं चलाता वह उसका बैरी है! | नीतिवचन 13:24

539

निर्बल लोगों को खेती बारी से बहुत भोजनवस्तु मिलती है | नीतिवचन 13:23

540

भला मनुष्य अपने नाती-पोतों के लिये भाग छोड़ जाता है | नीतिवचन 13:22

541

...धर्मियों को अच्छा फल मिलता है! | नीतिवचन 13:21

542

बुराई पापियों के पीछे पड़ती है! | नीतिवचन 13:21

543

बुद्धिमानों की संगति में तू भी बुद्धिमान हो जाएगा! | नीतिवचन 13:20

544

दुष्ट दूत बुराई में फंसता है | नीतिवचन 13:17

545

सुबुद्धि के कारण अनुग्रह होता है | नीतिवचन 13:15-16

546

जो वचन को तुच्छ जानता, वह नाश हो जाता है! | नीतिवचन 13:13

547

जब आशा पूरी होने में विलम्ब होता है, तो मन शिथिल होता है | नीतिवचन 13:12

548

जो अपने परिश्रम से बटोरता, उसकी बढ़ती होती है | नीतिवचन 13:11

549

धर्मियों की ज्योति आनन्द के साथ रहती है | नीतिवचन 13:9

550

कोई अपने आप को दौलतमंद जताता है लेकिन ग़रीब है | नीतिवचन 13:7-8

551

जो अपने मुंह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है! | नीतिवचन 13:3

552

सज्जन अपनी बातों के कारण उत्तम वस्तु खाने पाता है | नीतिवचन 13:2

553

बुद्धिमान पुत्र पिता की शिक्षा सुनता है | नीतिवचन 13:1

554

कामकाजी को अनमोल वस्तु मिलती है | नीतिवचन 12:28

555

कामकाजी को अनमोल वस्तु मिलती है | नीतिवचन 12:27

556

धर्मी अपने पड़ोसी की अगुवाई करता है! | नीतिवचन 12:26

557

उदास मन दब जाता है! | नीतिवचन 12:25

558

कामकाजी लोग प्रभुता करते हैं! | नीतिवचन 12:24

559

झूठों से यहोवा को घृणा आती है! | नीतिवचन 12:22

560

बिना सोच विचार का बोलना तलवार की नाईं चुभता है! | नीतिवचन 12:18-19

561

मूढ़ को अपनी ही चाल सीधी जान पड़ती है! | नीतिवचन 12:15

562

दुष्ट जन बुरे लोगों के जाल की अभिलाषा करते हैं | नीतिवचन 12:12

563

जो निकम्मों की संगति करता, वह निर्बुद्धि ठहरता है! | नीतिवचन 12:11

564

र्मी अपने पशु के भी प्राण की सुधि रखता है | नीतिवचन 12:10

565

हे सारी पृथ्वी के लोगों यहोवा का जयजयकार करो! | भजन संहिता 100:1-5

566

धर्मी को हानि नहीं होती है | नीतिवचन 12:21

567

मनुष्य कि बुद्धि के अनुसार उसकी प्रशंसा होती है | नीतिवचन 12:8-9

568

भली स्त्री अपने पति का मुकुट है | नीतिवचन 12:4

569

कोई मनुष्य दुष्टता के कारण स्थिर नहीं होता | नीतिवचन 12:2-3

570

धर्मी को पृथ्वी पर फल मिलेगा | नीतिवचन 11:30-31

571

परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा | यूहन्ना 3:16-17

572

वह उस घड़ी वहां आकर प्रभु का धन्यवाद करने लगी | लूका 2:38

573

आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है | लूका 2:10-11

574

डरो मत, खड़े खड़े वह उद्धार का काम देखो | निर्गमन 14:13

575

⚠️ ज़रूरी सूचना | दैनिक मन्ना ⚠️

576

जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है | लूका 1:28

577

जो अपने घराने को दु:ख देता, उसका भाग वायु ही होगा | नीतिवचन 11:29

578

जो अपने धन पर भरोसा रखता है वह गिर जाता है | नीतिवचन 11:28

579

जो दूसरे की बुराई का खोजी होता है, उसी पर बुराई आ पड़ती है | नीतिवचन 11:27

580

जो औरों की खेती सींचता है, उसकी भी सींची जाएगी | नीतिवचन 11:24-25

581

धर्मियों की लालसा तो केवल भलाई की होती है | नीतिवचन 11:23

582

जो स्त्री विवेक नहीं रखती, वह नथ पहिने हुए सूअर के समान है | नीतिवचन 11:22

583

मैं दृढ़ता के साथ कहता हूं, धर्मी का वंश बचाया जाएगा | नीतिवचन 11:21

584

कृपालु मनुष्य अपना ही भला करता है | नीतिवचन 11:17

585

अनुग्रह करने वाली स्त्री प्रतिष्ठा नहीं खोती है | नीतिवचन 11:16

586

सम्मति देने वालों की बहुतायत के कारण बचाव होता है | नीतिवचन 11:14

587

जो अपने पड़ोसी को तुच्छ जानता है, वह निर्बुद्धि है | नीतिवचन 11:12-13

588

सीधे लोगों के आशीर्वाद से नगर की बढ़ती होती है | नीतिवचन 11:10-11

589

भक्तिहीन जन अपने पड़ोसी को अपने मुंह की बात से बिगाड़ता है | नीतिवचन 11:9

590

जब दुष्ट मरता है, तब उसकी आशा टूट जाती है ! | नीतिवचन 11:7

591

धन से कुछ लाभ नहीं होता, धर्म मृत्यु से भी बचाता है | नीतिवचन 11:4 | दैनिक मन्ना

592

जब अभिमान होता है, तब अपमान भी होता है | नीतिवचन 11:2

593

छल के तराजू से यहोवा को घृणा आती है | नीतिवचन 11:1

594

धर्मी सदा अटल रहेगा, परन्तु दुष्ट पृथ्वी पर बसने न पाएंगे | नीतिवचन 10:29-30

595

यहोवा के भय मानने से आयु बढ़ती है | नीतिवचन 10:27-28

596

जैसे आंख को धूंआ, वैसे आलसी उन को लगता है जो उस को कहीं भेजते हैं | नीतिवचन 10:26

597

बवण्डर निकल जाते ही दुष्ट जन लोप हो जाता है | नीतिवचन 10:25

598

दुष्ट जन जिस विपत्ति से डरता है, वह उस पर आ पड़ती है | नीतिवचन 10:24

599

धन यहोवा की आशीष ही से मिलता है | नीतिवचन 10:22

600

धर्मी के वचनों से बहुतों का पालन पोषण होता है | नीतिवचन 10:20-21

601

जहां बहुत बातें होती हैं, वहां अपराध भी होता है | नीतिवचन 10:18-20

602

जो डांट से मुंह मोड़ता, वह भटकता है | नीतिवचन 10:17

603

धर्मी का परिश्रम जीवन के लिये होता है | नीतिवचन 10:16

604

कंगाल लोग निर्धन होने के कारण विनाश होते हैं | नीतिवचन 10:14-15

605

निर्बुद्धि की पीठ के लिये कोड़ा है | नीतिवचन 10:13

606

प्रेम से सब अपराध ढंप जाते हैं! | नीतिवचन 10:12

607

धर्मी का मुंह तो जीवन का सोता है | नीतिवचन 10:11

608

जो आँख मारता है, उस से औरों को दुख मिलता है | नीतिवचन 10:10

609

जो टेढ़ी चाल चलता है उसकी चाल प्रगट हो जाती है | नीतिवचन 10:9

610

जो बुद्धिमान है, वह आज्ञाओं को स्वीकार करता है | नीतिवचन 10:8

611

धर्मी को लोग आशीर्वाद देते हैं, परन्तु दुष्टों का नाम मिट जाता है | नीतिवचन 10:7

612

धर्मी पर बहुत से आर्शीवाद होते हैं | नीतिवचन 10:6

613

जो बेटा कटनी के समय भारी नींद में रहता है, वह लज्जा का कारण होता है | नीतिवचन 10:5

614

जो काम में ढिलाई करता है, वह निर्धन हो जाता है | नीतिवचन 10:4

615

धर्मी को यहोवा भूखा मरने नहीं देता | नीतिवचन 10:3

616

दुष्टों के धन से लाभ नही होता! | नीतिवचन 10:2

617

मूर्ख पुत्र के कारण माता उदास रहती है! | नीतिवचन 10:1

618

चोरी का पानी मीठा होता है! | नीतिवचन 9:13-18

619

यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है? | नीतिवचन 9:10-12

620

ठट्ठा करने वाले को न डांट ऐसा न हो कि वह तुझ से बैर रखे! | नीतिवचन 9:7-9

621

बुद्धि ने अपना घर बनाया और उसके सातों खंभे गढ़े हुए हैं | नीतिवचन 9:1-6

622

"जो मुझे पाता है, वह जीवन को पाता है..." | नीतिवचन 8:32-36

623

"यहोवा ने मुझे प्राचीनकाल के कामों से भी पहिले उत्पन्न किया..." | नीतिवचन 8:22-31

624

"मेरा फल चोखे सोने वरन कुन्दन से भी उत्तम है..." | नीतिवचन 8:18-21

625

"मेरे ही द्वारा राजा राज्य करते हैं..." | नीतिवचन 8:14-17

626

यहोवा का भय मानना, बुराई से बैर रखना है | नीतिवचन 8:12-13

627

चान्दी नहीं मेरी शिक्षा को लो | नीतिवचन 8:10-11

628

तेरा मन ऐसी स्त्री के मार्ग की ओर न फिरे | नीतिवचन 7:22-27

629

बुद्धि से कह कि, तू मेरी बहिन है | नीतिवचन 7:4-5

630

मेरी आज्ञाओं को मान, और अपने हृदय की पटिया पर लिख ले | नीतिवचन 7:1-3

631

क्योंकि जलन से पुरूष बहुत ही क्रोधित हो जाता है | नीतिवचन 6:34-35

632

जो परस्त्रीगमन करता है, वह अपने प्राणों को नाश करना चाहता है! | नीतिवचन 6:30-33

633

जो पराई स्त्री के पास जाता है, वह दण्ड से न बचेगा | नीतिवचन 6:27-29

634

आज्ञा तो दीपक है और शिक्षा ज्योति है | नीतिवचन 6:23-24

635

हे मेरे पुत्र, मेरी आज्ञा को मान | नीतिवचन 6:20-22

636

इन 6 वस्तुओं से यहोवा बैर रखता है! (भाग-2) | नीतिवचन 6:16-19

637

इन 6 वस्तुओं से यहोवा बैर रखता है! | नीतिवचन 6:16-17

638

अनर्थकारी पर विपत्ति अचानक आ पड़ेगी और वह नाश हो जाएगा! | नीतिवचन 6:12-15

639

हे आलसी, चींटियों के काम पर ध्यान दे | नीतिवचन 6:6-11

640

अपने पड़ोसी का कर्ज़दार न बन! | नीतिवचन 6:1-5

641

मनुष्य के मार्ग यहोवा की दृष्टि से छिपे नहीं हैं | नीतिवचन 5:21-23

642

तू अपने ही कूंए से सोते का जल पिया करना | नीतिवचन 5:15-17

643

अपने पांव को बुराई के मार्ग पर चलने से हटा ले | नीतिवचन 4:25-27

644

धर्मियों की चाल चमकती हुई ज्योति के समान है | नीतिवचन 4:18

645

दुष्टों की बाट में पांव न धरना | नीतिवचन 4:13-17

646

बुद्धि को प्राप्त कर, समझ को भी प्राप्त कर | नीतिवचन 4:5-9

647

तू मेरी आज्ञाओं का पालन कर तब जीवित रहेगा | नीतिवचन 4:1-4

648

हे मेरे पुत्रो, पिता की शिक्षा सुनो | नीतिवचन 4:1-2

649

बुद्धिमान महिमा को पाएंगे | नीतिवचन 3:35

650

दुष्ट के घर पर यहोवा का शाप होता है | नीतिवचन 3:33-35

651

उपद्रवी पुरूष से डाह न करना, और ना उसकी सी चाल चलना | नीतिवचन 3:30-32

652

भला करने से न रुकना | नीतिवचन 3:27-29

653

जब तू लेटेगा तब सुख की नींद आएगी | नीतिवचन 3:24-26

654

बुद्धि और समझ को अपनी नज़रों से ओझल होने न दें | नीतिवचन 3:21-23

655

हमारे परमेश्वर की रचनात्मक बुद्धि | नीतिवचन 3:19-20

656

शांतिपूर्ण और सुखी जीवन कैसे बिताए | नीतिवचन 3:16-18

657

क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाए | नीतिवचन 3:13-15

658

यहोवा जिस से प्रेम रखता है उस को डांटता है | नीतिवचन 3:11-12

659

अपनी संपत्ति देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना | नीतिवचन 3:9-10

660

अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना | नीतिवचन 3:7-8

661

अपने सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना | नीतिवचन 3:5-6

662

कृपा और सच्चाई तुझ से अलग न होने पाएं | नीतिवचन 3:3-4

663

शांतिपूर्ण और सफल जीवन का रहस्य | नीतिवचन 3:1-2

664

मीठी-बातें बोलने वाली स्त्री से सावधान! | नीतिवचन 2:16-18

665

परमेश्वर के बुद्धि की खोज करने का लाभ | नीतिवचन 2:7-8

666

परमेश्वर के ज्ञान के उपहार को खोजे | नीतिवचन 2:3-6

667

बुद्धि सड़क में ऊंचे स्वर से बोलती है | नीतिवचन 1:20-23

668

बुरी संगति रखने का खतरा! | नीतिवचन 1:10