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Title
301

E209 पत.2.१४ - कर्माशयके फलस्वरूप प्रप्त जाति,आयु और भोग सुखद दुःखद दो प्रकारके होते हैं।

302

E 208. शिवमहापुराण। भस्मकी महिमा और भस्मधारण की विधि।

303

E 207. शिवमहापुराण। शिव उपासना की त्रिवेणी - भस्म, रुद्राक्ष और शिवनाम।

304

E 206 योग-वेदान्त। योगसूत्र 2.13 की विशेष व्याख्या(2)-सृष्टिरचनाका उद्देश्य है जीवका उद्धार।

305

E 205. पातञ्जल योगसूत्र 2.13. "सतिमूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः" की विशेष व्याख्या।

306

E 204. पातञ्जल योग, सूत्र 2.9 से 13. अभिनिवेश।कर्माशय। प्रारब्ध, क्रियमाण और संचित कर्म।

307

E 203. पातञ्जल योग, सूत्र 2.6,7,8. अस्मिता और राग तथा द्वेष की परिभाषा।

308

E 202. पातञ्जल योगसूत्र - क्रियायोग (भाग 3) - सूत्र 2.2से5 - तप स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।

309

E 201. शिवमहापुराण 1.19-20 शिवकी आठ मूर्तियां।

310

E 200. शिवपुराण। मोक्ष क्या है ? बन्धन क्या है? शिवका अर्थ। गुरुका अर्थ। भस्मका रहस्य।

311

E 199. वर्णनिर्धारण (भाग 7) - महा, अनु १२१.७ आश्वमेधिक १६४.११-१२, ३६.२७-३१

312

E 198. योगसूत्र२.१, क्रियायोग (भाग 2) - तप क्या है? गीता अध्याय ६ एवं १७.

313

E 197. योगसूत्र 2.1 - क्रियायोग की परिभाषा। तपः स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः।

314

E 196. म.अनु.१४३ - वैश्य क्षत्रिय का क्रमशः ब्राह्मणजन्म, शूद्रका ब्राह्मणत्व ब्राह्मण का शूद्रत्व।

315

E 195 शिव/महा/विवेकचूडा़मणि।कर्मानुसारही कीट पशु पक्षी शूद्र क्षत्रिय वैश्य ब्राह्मण आदि शरीर।

316

E 194. शिव/महा/गीता। जीव का क्रमिक उद्धार।वर्णधर्म। स्वकर्मणा तमभ्यर्चन् सिद्धिं विन्दति मानवः।

317

E 193. पातञ्जल योगसूत्र। समाधिपाद का उपसंहार। साधनपाद की भूमिका।

318

E192. पातञ्जल योगसूत्र/महाभारत। प्राणायाम भाग-5. प्राण और प्रणव की सन्निकटता।

319

E 191. पातञ्जल योगसूत्र- प्राणायाम भाग 4. स्वर परिवर्तन, स्वर संध्या और दिवस संध्या।

320

E 190. पातञ्जल योगसूत्र- प्राणायाम भाग 3. इडा पिंगला सुषुम्णा इत्यादि नाडि़यों का वर्णन।

321

E 189. शिव/गीता/मानस/योगसूत्र। जपयोग -2.। यज्ञानां जपयज्ञोऽहं।प्रणव विचार- भाग 10।

322

E 188. शिवपुराण। प्रणव का प्रयोग। नवधा भक्ति।

323

E 187. शिवपुराण। मंत्रोंके संस्कार।मंत्रजप सम्बन्धी क्रियात्मक और तकनीकी मार्गदर्शन।

324

E 186. पातञ्जल योगसूत्र + शिवपुराण। प्रणव के भेद और जप-अनुष्ठान।

325

E 185. पातञ्जल योग, सूत्र 1.34 - प्राणायाम।

326

E184. योगसूत्र/गोरक्ष संहिता/गीता। प्राणायाम।रयि और प्राण।प्राणके दश प्रकार, उनके रहनेके स्थान।

327

E 183. शिवपुराण। दान-धर्म भाग-3।

328

E 182. शिवपुराण। दान-धर्म भाग-2।

329

E 181. शिवपुराण। दान-धर्म भाग-1. देश काल पात्र इत्यादि।

330

E 180. पातञ्जल योग, सूत्र 1.33 - चित्त शुद्धि और समाज-व्यवहार - भाग 2।

331

E 179. पातञ्जल योग, सूत्र 1.33- चित्त शुद्धि और समाज-व्यवहार ।

332

E 178 शिवपुराण/पातञ्जल योगसूत्र - प्रणवके विभिन्न अर्थ।

333

E 177. पातञ्जल योग, सूत्र 1.30-31 - योग की 14 बाधायें और उनके निराकरण के उपाय(...क्रमशः)

334

E 176. पातञ्जल योग, सूत्र 1.29-30 - तज्जपस्तदर्थभावनम्।

335

E 175. शिवपुराण। "जीव" शब्द की व्युत्पत्ति और उसके मुक्ति का उपाय। "पशुपति" का अर्थ।सकलीकरण क्या है?

336

E 174. तस्य वाचकः प्रणवः (भाग 4) *माण्डूक्य के अनुसार प्रणवकी व्याख्या।

337

E 173. तस्य वाचकः प्रणवः (भाग 3) *क्या प्रणव का सकाम प्रयोग हो सकता है ?

338

E 172. योगसूत्र- "तस्य वाचकः प्रणवः"भाग -2. अ ऊ म=जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति=ब्रह्मा विष्णु महेश।

339

E 171. पातञ्जल योग, सूत्र - "तस्य वाचकः प्रणवः" भाग -1.

340

E 170. पातञ्जल योग, सूत्र 25,26,27

341

E शिव 169. संन्यासी पर दया करनेका अपराध न करें। सन्यासीको जो कुछदें वह सेवाभावसे दें, दयाभावसे नहीं।

342

E 168. पातञ्जल योगसूत्र - ईश्वरकी परिभाषा(भाग 2)

343

E 167. योगसूत्र - ईश्वरकी परिभाषा(भाग 1) "क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टपुरुषविशेष ईश्वरः"(1.24).

344

E 166. पातञ्जल योगसूत्र।ईश्वरप्रणिधान क्या है?सूत्र 23,28 और 39.

345

E 165. शिवपुराण। सदाचार एवं वर्णनिर्धारण।

346

E 164. शिवपुराण। तीर्थोंके प्रकार। पाप पुण्य के विभाग।

347

E 163. पातञ्जल योग, सूत्र 21-22. साधकों की 9 श्रेणियां।

348

E 162. शिवपुराण। शिवलिंग का स्थापन पूजन और मन्त्रका क्रम।

349

E 161. शिवपुराण। शङ्करजी के पांच मुखोंके पांच कार्य- सृष्टि स्थिति संहार तिरोभाव और अनुग्रह।

350

E 160. पातञ्जल योग, सूत्र 15- वैराग्यकी परिभाषा।

351

E 159. पातञ्जल योग, सूत्र 14. भाग 2. अभ्यासके लक्षण। भगवद्गीताके अनुसार - श्रद्धा के प्रकार।

352

E 158. ब्रह्मा-विष्णुका द्वन्द-शिवलिंगका प्राकट्-ब्रह्माजीके पांचवें शिरका कटना और उनको शिवजीका शाप

353

E 157. शिवलिंग और शङ्करजीकी मूर्ति - इन दो रूपोंमें शङ्करजी की उपासना का रहस्य। शिवलिंग का प्राकट्य

354

E 156. पातञ्जल योग, सूत्र 14. तथा गीता 6.23-25- अभ्यास निरन्तर विना उकताये हुये और दीर्घकाल तक करें।

355

E 155. शिवपुराण अध्याय 1.3-4. भक्ति और कृपा अन्योन्याश्रित हैं।

356

E 154. पातञ्जल योग, सूत्र 13. "अभ्यास" की परिभाषा।

357

E 153. शिवपुराण, अध्याय 1.3 -1.13. विना भक्ति किये वेदान्त में सीधे प्रवेश नहीं करना चाहिये।

358

E 152. पातञ्जल योग, सूत्र 12 चित्तवृत्तियों का निरोध कैसे हो? भाग 2.

359

E 151. पातञ्जल योगसूत्र, 12 तथा गीता 6.3-37 चित्तवृत्तियों का निरोध कैसे हो ? (भाग 1)

360

E 150. शिवपुराण अध्याय 2। स्वधर्म और परधर्म क्या है?

361

E 149. योग-वेदान्त। सुषुप्ति और समाधि और मूर्च्छा में अन्तर।

362

E 148. शिव महापुराण।सूत किसे कहते थे?यह व्यक्तिका नाम था अथवा एक पद था?"लोमहर्षण" नामका अर्थ।

363

E 147. शिव महापुराण।पञ्चवक्त्र का अर्थ।शिवपूजाके समय पूज्य दस शिवगण।शिवमहापुराणकी भूमिका।

364

E 146. योग-वेदान्त। भेद वस्तुओंमें है, ज्ञानमें नहीं। केवल ईश्वर सर्वज्ञ है क्योंकि वह सर्वरूप है।

365

E 145. शिव महापुराण। मङ्गलाचरण

366

E 144. ईश्वर कालातीत दिशातीत और सर्वज्ञ है। पृथ्वीलोकका कालमान और ब्रह्मा विष्णु इत्यादिका कालमान।

367

E 143. योग-वेदान्त- सुषुप्तिमें आनन्दभुक् होने का अर्थ। जीवका आनन्द और ईश्वरका आनन्द।

368

E 142. योग-वेदान्त - सुषुप्तिके आनन्दका रहस्य

369

E 141. योग-वेदान्त - द्वैतका प्रमाण विक्षिप्त मन है और अद्वैतका प्रमाण समाहित मन है।

370

एपिसोड 140. योग-वेदान्त - आत्माके चार पादोंका चार वर्णों और चार आश्रमोंसे सादृश्य।

371

एपिसोड 139. योग-वेदान्त। सुषुप्ति। माण्डूक्य मंत्र 5 में "यत्र" (जहां) का अर्थ

372

एपिसोड 138. योग-वेदान्त - अज्ञान जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति तीनोंमें है।

373

एपिसोड 137. योग-वेदान्त - निद्रा और सुषुप्ति की परिभाषा।अभावप्रत्ययालम्बनावृत्तिर्निद्रा।

374

एपिसोड 136. योग-वेदान्त- स्वप्नमें मन ही देश काल वस्तु सहित नयी सृष्टि बनाकर खेलता है।

375

E135. विपरीत ज्ञान और परीत ज्ञान।स्वप्नमें जाग्रतवत् प्रतीत होता है।होता नहीं, केवल प्रतीत होता है।

376

134योग-वेदान्त- गहनाकर्मणोगति:।पूर्वजन्मकेऔर पूर्वजोंके संस्कारभी स्वप्नऔर जाग्रतमें प्रकटहोते हैं ।

377

E 133. योग-वेदान्त।स्वप्न,संस्कार,वासना,पूर्वजन्म।अविद्या,काम और कर्म।पूर्वजन्म की स्मृति का रहस्य ।

378

एपिसोड 132. योग-वेदान्त - स्वप्नके फलका विचार वेदान्तका विषय नहीं।

379

E131.योग-वेदान्त-कर्मोंकेफल स्वप्नमेंभी मिलते हैं-पूर्वमीमांसा,द्वैत,अद्वैत,आयुर्वेद मतोंका विष्लेषण

380

एपिसोड 130. योग-वेदान्त। स्वप्न और जाग्रतकी तुलना।

381

E 129. योग-वेदान्त। स्वप्न का स्वरूप क्या है? स्वप्नका द्रष्टा कौन है? माण्डूक्य और प्रश्नोपनिषद।

382

एपिसोड 128. योग-वेदान्त- स्वप्न - आत्मा का दूसरा चरण। माण्डूक्य मंत्र 4. की व्याख्या।

383

E127. योग-वेदान्त-गीता 6.29-32. "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति"। वास्तविक जागरण क्या है?

384

E 126. योग-वेदान्त। गीता 6.29-31. समदर्शन और समवर्तन (भाग 2)। व्यवहार और वेदान्तविचार।

385

E 125. योग-वेदान्त। समदर्शन और समवर्तन। गीता 6.29-30

386

E124.योग-वेदान्त।निवृत्तिक्रम-भाग2।वेदान्त और व्यवहारका सामञ्जस्य।व्यावहारिक सत्य और पारमार्थिक सत्य

387

E 123. योग-वेदान्त। निवृत्ति का क्रम। कैवल्य क्या है? भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग का विवेचन।

388

E 122. योग-वेदान्त। जागनेका अर्थ है - अपनी विश्वरूपता को पहचानना। माण्डूक्य मंत्र 2

389

E 121 योग-वेदान्त - यम नियम- साधन चतुष्टय (भाग 3)

390

E 120. योग-वेदान्त - यम नियम - साधन चतुष्टय (भाग2)

391

एपिसोड 119 - योग-वेदान्त - यम नियम - साधन चतुष्टय (भाग 1)- तत्वबोधः 1-4

392

E118. योग-वेदान्त-स्वप्नऔर सुषुप्तिकी परिभाषा। जाग्रतऔर सुषुप्तिसे स्वप्नका अन्तर। इन्द्रियका अर्थ।

393

E 117. योग-वेदान्त। माण्डूक्य मंत्र 3. आत्माका प्रथम चरण वैश्वानर- इसके 7 अंग और 19 मुख हैं।

394

E116योगवेदान्त- जाग्रत,स्वप्न,सुषुप्ति,तुरीय। अन्तःकरण चतुष्टयके सम्बन्धमें वेदान्त और योगकी दृष्टि

395

एपिसोड 115. योग-वेदान्त- दुःख हमारे मनकी बनाई हुई सृष्टिमें है, ईश्वरकी बनाई सृष्टिमें नहीं।

396

E114.योग-वेदान्त। स्वप्न और जाग्रत की व्याख्या। अपनी विश्वरूपता को जानो। सत्यम् ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।

397

E113. योग-वेदान्त.स्वप्न क्या है?स्वप्नऔर जाग्रतकी तुलना।क्या पुण्य-पापका फल स्वप्नमें भी मिलता है?

398

E 112. योग-वेदान्त। सुख पाने के लिये कोई प्रयास नहीं करना होता।

399

111. योग-वेदान्त। जागरण क्या है? दुःख क्या है? माण्डूक्य उपनिषद, मंत्र ३ की व्याख्या (भाग २)

400

E110. योग-वेदान्त। माण्डूक्य उपनिषद। जाग्रत अवस्था क्या है? हमारी विश्वरूपता क्या है?